नई दिल्ली। राजवीर दीक्षित
(Supreme Court Clarifies Law on False Promise of Marriage Cases)सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से बने निजी संबंधों के बाद आपराधिक मामलों के बढ़ते चलन पर गंभीर चिंता जताते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला पहले से विवाहित है और वह किसी अन्य पुरुष के साथ सहमति से शारीरिक संबंध बनाती है, तो केवल शादी के वादे के आधार पर वह उसके खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज नहीं करा सकती।
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न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में महिला स्वयं कानूनन विवाह के लिए पात्र नहीं होती, क्योंकि उसका वैवाहिक संबंध पहले से मौजूद होता है। ऐसे में ‘शादी के झूठे वादे’ का आधार स्वतः ही कमजोर हो जाता है और इसे कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
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यह टिप्पणी एक वकील के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए की गई, जिसमें एक महिला वकील ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर उसके साथ बलात्कार किया। अदालत ने पाया कि दोनों के बीच संबंध पूरी तरह सहमति से बने थे और बाद में रिश्ते बिगड़ने के कारण मामला दर्ज किया गया, जो “सहमति से बने रिश्ते के कटु हो जाने का क्लासिक उदाहरण” है।
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सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 (i) का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति का जीवनसाथी जीवित है, तो वह दूसरा विवाह नहीं कर सकता। ऐसे में इस आधार पर किया गया कोई भी वादा कानून की नजर में मान्य नहीं हो सकता।
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अदालत ने यह भी चेताया कि कानून के दुरुपयोग की प्रवृत्ति बढ़ रही है और न्यायालयों को वास्तविक बलात्कार के मामलों और निजी विवादों के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा। यह फैसला न केवल आपराधिक न्याय प्रणाली की रक्षा करता है, बल्कि झूठे मामलों से निर्दोष लोगों को बचाने की दिशा में भी एक अहम कदम माना जा रहा है।

















