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गुलजार की प्रकृति से आत्मीयता: सलीम आरिफ ने पर्यावरण संरक्षण पर कवि के अनछुए पहलुओं को किया उजागर

गुलजार की प्रकृति से आत्मीयता: सलीम आरिफ ने पर्यावरण संरक्षण पर कवि के अनछुए पहलुओं को किया उजागर

टारगेट न्यूज़ संवाददाता: मशहूर गीतकार, पटकथा लेखक और शायर गुलजार साहब की प्रकृति के साथ नजदीकी किसी से छिपी नहीं है, लेकिन उनके इस अनूठे और गहरे जुड़ाव के कई ऐसे पहलू हैं जो अब तक आम जनता की नजरों से दूर रहे हैं। पिछले करीब चार दशकों से गुलजार साहब के साथ बेहद करीब से जुड़े रहे जाने-माने रंगकर्मी और निर्देशक सलीम आरिफ ने अब इस विषय पर खुलकर बात की है। सलीम आरिफ ने गुलजार की पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता, उनकी कविताओं में प्रकृति की गूंज और उनके इस अनूठे प्रेम के विभिन्न आयामों को दुनिया के सामने लाने के लिए एक विशेष परियोजना पर काम किया है। इस आगामी प्रोजेक्ट का नाम ‘आब्-ओ-हवा’ रखा गया है, जिसके जरिए गुलजार की पर्यावरण-केंद्रित रचनाओं की गहराई को बेहद खूबसूरती से महसूस किया जा सकेगा। यह पहल न केवल लोगों में प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान जगाएगी, बल्कि यह भी याद दिलाएगी कि पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों या कागजी योजनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसकी शुरुआत हमारे अपने भीतर से होनी चाहिए।

ताज़ा अपडेट्स और मुख्य बिंदु (Fresh Updates)

  • सलीम आरिफ पिछले लगभग चालीस वर्षों से गुलजार साहब के साथ पेशेवर और व्यक्तिगत रूप से जुड़े हुए हैं।
  • आगामी प्रोजेक्ट ‘आब्-ओ-हवा’ का मुख्य उद्देश्य गुलजार की कविताओं और गीतों में छिपे पर्यावरण प्रेम को उजागर करना है।
  • यह परियोजना इस बात पर जोर देती है कि प्रकृति को बचाने के लिए मानवीय व्यवहार में आंतरिक बदलाव कितना जरूरी है।
  • गुलजार की रचनाएं हमेशा से पेड़ों, नदियों, हवा और पहाड़ों के प्रति उनके अगाध स्नेह को दर्शाती रही हैं।

विस्तार से समझें पूरा मामला (In-Depth Explanation)

गुलजार साहब का साहित्य हमेशा से आम आदमी की भावनाओं और प्रकृति के बीच की बारीक डोर को मजबूत करता रहा है। उनकी कविताओं में बारिश की बूंदों की खड़खड़ाहट, सूखी पत्तियों की सरसराहट और सुबह की पहली किरण का अहसास बहुत ही सजीव रूप से झलकता है। सलीम आरिफ का यह नया प्रोजेक्ट इसी संवेदनशीलता को मंच देने का एक गंभीर प्रयास है। आरिफ का मानना है कि गुलजार साहब केवल एक रचनाकार नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति के एक सच्चे प्रहरी और गहरे अध्ययनकर्ता भी हैं। ‘आब्-ओ-हवा’ के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया जा रहा है कि कैसे आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने अपनी प्राकृतिक विरासत को नुकसान पहुंचाया है और कैसे गुलजार की शायरी हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का रास्ता दिखाती है। उनकी रचनाओं में प्रकृति कोई निर्जीव वस्तु नहीं, बल्कि एक जीवंत पात्र की तरह नजर आती है जो इंसानों से संवाद करती है।

सलीम आरिफ ने साझा किया कि गुलजार साहब की जिज्ञासा आज भी एक छोटे बच्चे जैसी है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे प्रकृति के हर छोटे-बड़े बदलाव को बहुत बारीकी से नोटिस करते हैं और अपनी डायरी या कविताओं में दर्ज करते हैं। चाहे वह गुलमोहर के पेड़ों का गिरना हो या आसमान में बदलते बादलों के रंग, हर चीज उन्हें गहराई से प्रभावित करती है। यह परियोजना दर्शकों और श्रोताओं को उसी भावनात्मक यात्रा पर ले जाने का वादा करती है, जहां वे अपनी व्यस्त जिंदगी से थोड़ा वक्त निकालकर अपने आसपास के पर्यावरण के साथ एक आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस कर सकें।

सामाजिक व आर्थिक प्रभाव (Social & Economic Impact)

आज के दौर में जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है, तब कला और साहित्य के माध्यम से लोगों को जागरूक करना बेहद प्रभावी साबित हो सकता है। गुलजार जैसे दिग्गज रचनाकार की कविताओं को जब ‘आब्-ओ-हवा’ जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए मंच मिलता है, तो यह समाज के वैचारिक धरातल पर गहरा असर डालता है। आर्थिक विकास के नाम पर जंगलों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बीच, यह कलात्मक अभिव्यक्ति लोगों को सोचने पर मजबूर करती है कि टिकाऊ विकास (Sustainable Development) क्यों जरूरी है। जब लोग भावनात्मक रूप से प्रकृति से जुड़ते हैं, तो वे पर्यावरण संरक्षण के प्रति स्वतः ही जिम्मेदार नागरिक बन जाते हैं। यह सामाजिक और मानसिक बदलाव किसी भी बड़े सरकारी अभियान से ज्यादा लंबे समय तक टिकने वाला साबित हो सकता है।

सलीम आरिफ ने कहा, गुलजार साहब की प्रकृति के साथ आत्मीयता केवल दिखावा नहीं है, बल्कि यह उनके वजूद का हिस्सा है। उनकी हर एक रचना हमें यह याद दिलाती है कि हम प्रकृति से अलग नहीं हैं, बल्कि हम इसी का एक अभिन्न हिस्सा हैं। जब तक हम इस सच को अपने भीतर स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक बाहरी बदलाव लाना असंभव है।

संक्षिप्त निष्कर्ष (Summary & Outlook)

कुल मिलाकर, सलीम आरिफ की यह पहल गुलजार साहब के साहित्यिक सफर में एक और मील का पत्थर साबित होने जा रही है। ‘आब्-ओ-हवा’ सिर्फ एक सांस्कृतिक परियोजना नहीं है, बल्कि यह आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत यानी पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक मार्मिक और प्रभावशाली अपील है। यह हमें यह सिखाती है कि प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता कितना पुराना और मजबूत है, और इसे बचाए रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। गुलजार की शायरी के जरिए पर्यावरण को बचाने का यह संदेश आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।

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