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पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने डीए मामले में राज्य सरकार को लगाई फटकार, मुख्य सचिव को किया तलब

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने डीए मामले में राज्य सरकार को लगाई फटकार, मुख्य सचिव को किया तलब

टारगेट न्यूज़ संवाददाता: पंजाब में कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते यानी डीए (DA) और महंगाई राहत (DR) के भुगतान को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार द्वारा अदालत के साथ ‘लुका-छिपी’ का खेल खेलने का गंभीर आरोप लगाया है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए मंगलवार सुबह मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है। इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है और सरकार की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत का मानना है कि कर्मचारियों के वैध वित्तीय लाभों को लटकाने के लिए जानबूझकर कानूनी प्रक्रियाओं में देरी की जा रही है, जो कि न्याय हित के बिल्कुल विपरीत है।

ताज़ा अपडेट्स और मुख्य बिंदु (Fresh Updates)

  • पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के दावों पर कड़ा संज्ञान लिया है।
  • अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि वह तुरंत उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री से अपील की मौजूदा स्थिति (Status Report) की जानकारी प्राप्त करे।
  • राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए दावों के विपरीत, सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर मामला अभी भी ‘डिफेक्ट’ (कमियों) की सूची में दर्ज पाया गया है।
  • सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी नोट किया कि पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) की अपील भी कमियों के कारण लंबित पड़ी है।
  • मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का सख्त निर्देश जारी किया है।

विस्तार से समझें पूरा मामला (In-Depth Explanation)

यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पंजाब सरकार को अपने कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को केंद्र सरकार के पैटर्न पर और अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की तर्ज पर डीए और डीआर का भुगतान करने का निर्देश दिया था। इस संबंध में अदालत ने पहले 8 अप्रैल को और बाद में 3 अगस्त को विस्तृत आदेश पारित किए थे, जिसमें सरकार को एक निश्चित समय सीमा के भीतर बकाया किस्तों का भुगतान करने को कहा गया था। हालांकि, राज्य सरकार और पीएसपीसीएल (PSPCL) ने इन आदेशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी (विशेष अनुमति याचिका) दायर करने का दावा किया। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि 1 सितंबर को अपील दायर किए जाने के बावजूद, एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उसमें मौजूद कमियों को दूर नहीं किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने बार-बार सुनवाई स्थगित करके राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपनी कानूनी रेमेडी अपनाने का पूरा अवसर दिया था, लेकिन इसके बावजूद केवल समय बिताने के प्रयास किए गए। वरिष्ठ वकीलों ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि सरकार अन्य विज्ञापनों और मदों में हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है, लेकिन दशकों तक सेवा देने वाले सेवानिवृत्त कर्मचारियों के हक का पैसा देने में आनाकानी की जा रही है।

सामाजिक व आर्थिक प्रभाव (Social & Economic Impact)

इस कानूनी गतिरोध का सबसे बुरा असर राज्य के लाखों सेवारत कर्मचारियों और विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों व पेंशनभोगियों पर पड़ रहा है। बढ़ती महंगाई के दौर में डीए और डीआर का भुगतान न होना उनके आर्थिक जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। न्यायाधीशों ने खुद इस बात का जिक्र किया कि जब भी यह मामला सूचीबद्ध होता है, अदालत कक्ष में बड़ी संख्या में बुजुर्ग पेंशनभोगी अपनी उम्मीदों के साथ मौजूद रहते हैं, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। यह स्थिति समाज में सरकारी व्यवस्था के प्रति अविश्वास को जन्म देती है। दूसरी ओर, यदि राज्य सरकार पर वित्तीय बोझ की बात करें, तो समय पर भुगतान न करने से कानूनी ब्याज और मुकदमों का खर्च और अधिक बढ़ जाता है, जिससे अंततः राज्य के राजकोष पर ही अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा, ‘हम यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि पंजाब सरकार आखिर क्या करना चाहती है और अदालत के समक्ष इस तरह लुका-छिपी का खेल क्यों खेल रही है। यदि अपील 1 सितंबर को ही दायर हो चुकी थी, तो अब तक उस पर सुनवाई हो चुकी होती।’

संक्षिप्त निष्कर्ष (Summary & Outlook)

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा डीए मामले में दिखाई गई सख्ती यह दर्शाती है कि न्यायपालिका कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों के हनन को लेकर बेहद गंभीर है। मुख्य सचिव की व्यक्तिगत पेशी और सुप्रीम कोर्ट से स्टेटस रिपोर्ट मंगवाने के निर्देश से साफ है कि अब इस मामले में और अधिक टालमटोल संभव नहीं होगी। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिकाओं की कमियों को कितनी जल्दी दूर करती है और अदालत के निर्देशों के अनुपालन में कर्मचारियों के बकाये के भुगतान पर क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं। अंततः यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के शासन की परीक्षा बन चुका है।

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