टारगेट न्यूज़ संवाददाता: पंजाब में कानून-व्यवस्था की स्थिति और नशे के खिलाफ चल रहे अभियानों को लेकर राजनीतिक घमासान एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। मानसा जिले में नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह उर्फ झोटा की गोली मारकर की गई हत्या के बाद राज्य की विपक्षी पार्टियों ने मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (आप) सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्षी नेताओं ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए राज्य में ‘जंगल राज’ कायम होने का आरोप लगाया है और सरकार के बहुप्रचारित ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। इस सनसनीखेज वारदात के बाद से न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है, बल्कि आम जनता और सामाजिक संगठनों में भी गहरा रोष देखने को मिल रहा है। विपक्षी दलों का साफ तौर पर कहना है कि राज्य में अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं और जो लोग समाज से नशा खत्म करने के लिए आगे आ रहे हैं, उनकी सुरक्षा करने में सरकार पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है। इस पूरे घटनाक्रम ने पंजाब की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक मशीनरी की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
ताज़ा अपडेट्स और मुख्य बिंदु (Fresh Updates)
- मानसा में नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह उर्फ झोटा की हत्या के बाद पंजाब की राजनीति में भूचाल आ गया है।
- शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने हत्या पर गहरा दुख जताते हुए राज्य में कानून-व्यवस्था के पूरी तरह चरमराने का आरोप लगाया।
- भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भी भगवंत मान सरकार पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग की है।
- विपक्ष का आरोप है कि सरकार का ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान पूरी तरह फ्लॉप साबित हुआ है और राज्य में गैंगस्टरों के हौसले बुलंद हैं।
- मृतक झोटा लंबे समय से क्षेत्र में नशा तस्करी के खिलाफ आवाज उठा रहे थे और उन्होंने कई मौकों पर तस्करों के खिलाफ मोर्चा खोला था।
विस्तार से समझें पूरा मामला (In-Depth Explanation)
यह पूरा मामला तब गरमाया जब मानसा जिले में परविंदर सिंह झोटा को अज्ञात हमलावरों ने गोलियों का शिकार बना दिया। परविंदर सिंह पंजाब में एक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते थे जो खुलकर नशे के कारोबार के खिलाफत करते थे। उनके समर्थकों और परिजनों के अनुसार, उन्होंने कई मौकों पर ड्रग्स तस्करों को पकड़वाने और प्रशासन की मदद करने में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि, इस साहसिक कार्य के कारण वे लंबे समय से असामाजिक तत्वों के निशाने पर थे। पिछले कुछ वर्षों में उन पर कई बार अप्रत्यक्ष दबाव भी बनाया गया था, लेकिन उन्होंने नशे के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखा।
झोटा की हत्या की खबर सामने आते ही पंजाब के तमाम विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं ने सोशल मीडिया और प्रेस बयानों के जरिए सरकार पर चौतरफा हमले शुरू कर दिए। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था का नामोनिशान नहीं बचा है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से एक नशा विरोधी कार्यकर्ता को मौत के घाट उतारा गया है, वह साबित करता है कि पंजाब में अपराधियों में कानून का कोई खौफ नहीं है। अकाली दल प्रमुख ने सरकार के दावों पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ का नारा केवल विज्ञापनों तक सीमित है, जबकि धरातल पर नशे का अवैध कारोबार बदस्तूर जारी है और इसके सौदागर खुलेआम घूम रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं ने भी इस घटना को लेकर सरकार को आड़े हाथों लिया। भाजपा नेताओं ने पंजाब की स्थिति को ‘जंगल राज’ की संज्ञा देते हुए कहा कि राज्य में हत्याएं, गोलीबारी की घटनाएं और गैंगवार आम बात हो गई है। उन्होंने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री भगवंत मान को आड़े हाथों लेते हुए उनकी प्रशासनिक विफलता पर सवाल उठाया और नैतिक आधार पर उनके इस्तीफे की मांग की। भाजपा नेताओं का कहना था कि जब एक सामाजिक कार्यकर्ता ही सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा।
कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भी इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे पूर्व में भी झोटा को राजनीतिक और प्रशासनिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि जब झोटा ने समाज से नशा मिटाने का बीड़ा उठाया था, तब राज्य सरकार को उनका समर्थन करना चाहिए था, लेकिन सरकार ने उनके संघर्ष को कमजोर करने का काम किया। पुलिस महानिदेशक (DGP) के उन बयानों का भी हवाला दिया गया जिसमें हाल ही में फार्मास्युटिकल यानी मेडिकल नशों के बढ़ते चलन पर चिंता जताई गई थी। विपक्ष ने पूछा कि जब सरकार को पहले से ही इन अवैध मेडिकल नशों के बारे में जानकारी थी, तो इनकी सप्लाई रोकने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए और ड्रग इंस्पेक्टरों की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई।
सामाजिक व आर्थिक प्रभाव (Social & Economic Impact)
इस घटना का पंजाब के सामाजिक ताने-बाने पर बहुत गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पंजाब पहले से ही सीमावर्ती राज्य होने के कारण नशीली दवाओं के अवैध व्यापार और तस्करी जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे समय में जब युवा पीढ़ी नशे की दलदल में धंस रही है, परविंदर सिंह झोटा जैसे युवाओं का आगे आकर इसके खिलाफ खड़ा होना एक सकारात्मक उम्मीद जगाता था। लेकिन इस प्रकार की लक्षित हत्याओं से समाज में एक भारी डर का माहौल बन जाता है। आम लोग और युवा जो समाज सुधार के कार्यों में अपना योगदान देना चाहते हैं, वे अब सामने आने से डरेंगे क्योंकि उन्हें अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता सताने लगेगी।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो कानून-व्यवस्था की ऐसी बिगड़ती स्थिति निवेशकों के मन में भी राज्य के प्रति अविश्वास पैदा करती है। जब किसी राज्य में सरेआम ऐसी वारदातें होने लगें और राजनीतिक अस्थिरता या टकराव की स्थिति बनी रहे, तो उद्योगपति वहां निवेश करने से कतराते हैं। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होने की गति धीमी पड़ जाती है, जो अंततः राज्य की अर्थव्यवस्था को कमजोर करती है। नशाखोरी के कारण पहले ही पंजाब की युवा शक्ति का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से अनुत्पादक हो रहा है, और यदि नशा विरोधी कार्यकर्ताओं को ही खत्म कर दिया जाएगा, तो इस सामाजिक कैंसर का इलाज करना और भी अधिक कठिन हो जाएगा।
पंजाब में कानून-व्यवस्था पूरी तरह से पटरी से उतर चुकी है और राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुंह मोड़ चुकी है। नशा विरोधी कार्यकर्ताओं की हत्या यह साबित करती है कि सरकार अपराधियों पर लगाम लगाने में पूरी तरह विफल रही है और हम इस ‘जंगल राज’ को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे।
संक्षिप्त निष्कर्ष (Summary & Outlook)
परविंदर सिंह झोटा की हत्या ने एक बार फिर से पंजाब की सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक सुस्ती और नशा मुक्ति के दावों की पोल खोल दी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर छिड़ा सियासी संग्राम आने वाले दिनों में और अधिक तेज होने के आसार हैं। जनता अब केवल राजनीतिक बयानों और आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है, बल्कि वह चाहती है कि सरकार इस मामले में त्वरित, पारदर्शी और सख्त कार्रवाई करे। यह समय राज्य सरकार के लिए आत्ममंथन करने और अपनी प्राथमिकताओं को दोबारा तय करने का है। यदि पंजाब को वास्तव में ‘रंगला पंजाब’ और नशा मुक्त बनाना है, तो केवल नारों और विज्ञापनों से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर कड़े कदम उठाने होंगे, अपराधियों के गठजोड़ को तोड़ना होगा और समाज के उन सच्चे प्रहरियों को सुरक्षा प्रदान करनी होगी जो अपनी जान जोखिम में डालकर इस अभियान में जुटे हैं।


















