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पंजाब में नशे के सौदागरों का आतंक: एंटी-ड्रग एक्टिविस्ट की हत्या के बाद फार्मास्युटिकल माफिया बेनकाब

पंजाब में नशे के सौदागरों का आतंक: एंटी-ड्रग एक्टिविस्ट की हत्या के बाद फार्मास्युटिकल माफिया बेनकाब

टारगेट न्यूज़: पंजाब के मानसा जिले में एंटी-ड्रग एक्टिविस्ट परविंदर सिंह झोटा की सरेआम गोली मारकर की गई हत्या ने एक बार फिर राज्य के स्वास्थ्य तंत्र, प्रशासनिक अमले और फार्मास्युटिकल माफिया के बीच की खौफनाक सांठगांठ को उजागर कर दिया है। इस सनसनीखेज वारदात के मुख्य आरोपी केमिस्ट अश्विनी कुमार की पृष्ठभूमि और उसके मेडिकल स्टोर पर हुई कार्रवाइयों के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे न केवल हैरान करने वाले हैं बल्कि सरकारी महकमों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं। आरोपी केमिस्ट के मेडिकल स्टोर पर पिछले चार वर्षों में करीब दस बार छापे मारे जा चुके हैं और उसका लाइसेंस तीन बार निलंबित भी किया गया था, लेकिन इसके बावजूद उसका अवैध कारोबार बदस्तूर फल-फूल रहा था। इस घटना के बाद पूरे राज्य में आक्रोश का माहौल है और ड्रग्स के खिलाफ काम कर रहे संगठनों के साथ-साथ आम जनता में भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गहरी चिंता देखने को मिल रही है।

मुख्य बिंदु एवं हाइलाइट्स (Key Highlights)

  • मानसा में एंटी-ड्रग एक्टिविस्ट परविंदर सिंह झोटा की केमिस्ट अश्विनी कुमार द्वारा गोली मारकर हत्या।
  • पिछले चार वर्षों में आरोपी के मेडिकल स्टोर पर 10 बार छापे मारे गए और तीन बार लाइसेंस निलंबित हुआ, लेकिन लाइसेंस रद्द नहीं किया गया।
  • एनसीबी (नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो) की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में पंजाब में कोडिन-युक्त कफ सिरप की 8,95,508 बोतलें जब्त की गईं, जो देश में सबसे अधिक हैं।
  • पंजाब केमिस्ट एसोसिएशन ने ऐसी ‘काली भेड़ों’ के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है और राज्यभर के केमिस्टों के लिए एडवाइजरी जारी की है।
  • नार्को-माफिया और राजनीतिक संरक्षण के गठजोड़ पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के पूर्व अधिकारियों ने भी गंभीर सवाल उठाए हैं।

विस्तृत समाचार एवं पूरा घटनाक्रम (Detailed Report)

घटना की गहराई में जाने पर यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार कागजी कार्रवाई और दिखावटी छापों के जरिए असल अपराधियों को बचाया जाता रहा है। मानसा के ड्रग इंस्पेक्टर नरेश कुमार के अनुसार, आरोपी अश्विनी कुमार के खिलाफ ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत मामला दर्ज था और वह हाल ही में बरी हुआ था। पुलिस सूत्रों ने बताया कि उसके स्टोर से कई बार प्रतिबंधित और नशीली दवाएं बरामद की गईं, जिसके चलते उसका लाइसेंस तीन मौकों पर निलंबित किया गया। हालांकि, नियमों के गंभीर उल्लंघन के बावजूद उसका लाइसेंस कभी पूरी तरह रद्द नहीं किया गया, जिससे उसे अवैध कारोबार जारी रखने का खुला लाइसेंस मिलता रहा। पंजाब केमिस्ट एसोसिएशन (PCA) के महासचिव जीएस चावला ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि ऐसे लोग पूरे फार्मास्युटिकल व्यापार को बदनाम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आरोपी को 2023 में भी अनधिकृत रूप से प्रिस्क्रिप्शन दवाएं बेचने के आरोप में जेल भेजा गया था, फिर यह सवाल लाजिमी है कि उसका लाइसेंस क्यों नहीं रद्द किया गया और उसे हथियारों का लाइसेंस कैसे मिल गया।

विशेषज्ञों और प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि इस तरह के अवैध धंधे बिना किसी राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के पनप ही नहीं सकते। प्रवर्तन निदेशालय (ED) के पूर्व उप निदेशक निरंजन सिंह ने आरोप लगाया है कि इस नेटवर्क में स्थानीय पुलिस, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी, स्थानीय नेता और मंत्री तक शामिल हैं, जिनका कथित तौर पर अपना हिस्सा होता है। उन्होंने कहा कि राज्य में बाहर से आने वाली ड्रग्स की तस्करी को रोकने के तमाम दावों के बीच स्थानीय स्तर पर विनिर्माण इकाइयों से होने वाली दवाओं की चोरी और उनकी अवैध बिक्री को रोकने के लिए कभी ठोस कदम नहीं उठाए गए। दूसरी ओर, जब मीडिया और जांचकर्ताओं ने इस संबंध में संयुक्त आयुक्त (ड्रग्स) संजीव कुमार और जोनल लाइसेंसिंग अथॉरिटी अमन वर्मा से संपर्क किया, तो वे या तो विभाग की कार्रवाई की रिपोर्ट साझा करने से बचते नजर आए या उनके पास मामलों का कोई पुख्ता रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं था, जो प्रशासनिक उदासीनता को साफ दर्शाता है।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की नवीनतम रिपोर्ट इस पूरे मामले में एक और डरावनी तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 के दौरान पंजाब में कोडिन-युक्त कफ सिरप की 8,95,508 बोतलें जब्त की गईं, जो देश के किसी भी अन्य राज्य के मुकाबले सबसे ज्यादा हैं। इसके अलावा, देश में कुल पकड़ी गई हेरोइन का 58 प्रतिशत हिस्सा यानी 2,086 किलोग्राम सिर्फ पंजाब से जब्त किया गया। रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि ब्युप्रेनोर्फिन, ट्रामाडोल और अल्प्राजोलम जैसी कानूनी रूप से निर्मित सस्ती दवाएं जो गैर-अनुपालन करने वाली फार्मेसियों के माध्यम से आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं, अब ड्रग्स के आदी लोगों के लिए हेरोइन और अन्य महंगे पदार्थों का एक आसान विकल्प बन चुकी हैं।

यह एक ऐसा सुनियोजित तंत्र है जहां स्थानीय पुलिस से लेकर स्वास्थ्य विभाग और राजनेताओं तक की मिलीभगत होती है। हम सीमाओं पर तस्करी रोक सकते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर हो रही अवैध दवाओं की बिक्री और लीकेज को रोकने के लिए गंभीर इच्छाशक्ति का अभाव है – निरंजन सिंह, पूर्व उप निदेशक, ईडी

भविष्य का असर एवं निष्कर्ष (Future Impact & Conclusion)

परविंदर सिंह झोटा की हत्या और उससे जुड़े तथ्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि पंजाब में नशा विरोधी मुहिम को कमजोर करने के लिए भीतरघात और प्रशासनिक लापरवाही किस हद तक हावी है। यदि सरकार ने अब भी ड्रग्स के अवैध कारोबार में लिप्त मेडिकल स्टोरों, भ्रष्ट अधिकारियों और दवा निर्माताओं के खिलाफ मिसाल कायम करने वाली सख्त कार्रवाई नहीं की, तो राज्य की युवा पीढ़ी को इस दलदल से बाहर निकालना नामुमकिन हो जाएगा। जरूरत इस बात की है कि केवल छोटे स्तर के विक्रेताओं पर शिकंजा कसने के बजाय इस पूरे सिंडिकेट की तह तक जाकर सख्त कानूनी कदम उठाए जाएं और ड्रग माफिया के राजनीतिक संरक्षण को जड़ से उखाड़ फेंका जाए।

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