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तिब्बत के सर्वोच्च धार्मिक उत्तराधिकारी पर चीन का कोई अधिकार नहीं: शिक्योंग पेनपा त्सेरिंग का कड़ा बयान

तिब्बत के सर्वोच्च धार्मिक उत्तराधिकारी पर चीन का कोई अधिकार नहीं: शिक्योंग पेनपा त्सेरिंग का कड़ा बयान

टारगेट न्यूज़ की विशेष रिपोर्ट: तिब्बती प्रशासन के प्रमुख शिक्योंग पेनपा त्सेरिंग ने चीन को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि बीजिंग के पास दलाई लामा के उत्तराधिकार और पुनर्जन्म की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार या वैधता नहीं है। प्राग में आयोजित 30वें फोरम 2000 सम्मेलन के दौरान ‘जब आस्था राजनीतिक हो जाती है: अधिनायकवाद के युग में स्वतंत्रता की रक्षा’ विषय पर आयोजित एक उच्च स्तरीय पैनल चर्चा में बोलते हुए उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से तिब्बत की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए मजबूत राजनीतिक और कूटनीतिक प्रस्ताव पारित करने का पुरजोर आह्वान किया है। उन्होंने बीजिंग की दमनकारी नीतियों पर भी खुलकर बात की।

घटना की गहराई और प्रमुख पहलू (Deep Breakdown)

  • शिक्योंग पेनपा त्सेरिंग ने स्पष्ट किया कि अगले दलाई लामा को पहचानने का एकमात्र अधिकार और अधिकार क्षेत्र केवल भारत में पंजीकृत गदेन फोड्रंग ट्रस्ट के पास ही सुरक्षित है।
  • उन्होंने वर्ष 1995 में 11वें पंचेन लामा गेशुंग चोएकी न्यीमा के जबरन अपहरण और गायब किए जाने का विशेष रूप से उल्लेख किया, जो तिब्बती मामलों में चीनी हस्तक्षेप का सबसे बड़ा और खतरनाक उदाहरण है।
  • तिब्बत में सांस्कृतिक और भाषाई अस्मिता को कुचलने के लिए चीन की ‘एथनिक यूनिटी लॉ’ और औपनिवेशिक शैली के रेजिडेंशियल स्कूलों के जरिए बच्चों को उनके मूल धर्म व संस्कृति से दूर करने की साजिश रची जा रही है।
  • सम्मेलन के दौरान उन्होंने जर्मनी, जापान, अमेरिका और यूरोपीय संघ के कई प्रमुख सांसदों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वैश्विक नेताओं के साथ उच्च स्तरीय कूटनीतिक बैठकें कीं।

पृष्ठभूमि और बड़ा परिदृश्य (Background & Context)

दलाई लामा का उत्तराधिकार तिब्बती बौद्ध धर्म की सबसे पवित्र और संवेदनशील आध्यात्मिक प्रक्रिया है। वर्तमान 14वें दलाई लामा त्सुन्जीन ग्यात्सो वर्तमान में भारत के धर्मशाला में निवास कर रहे हैं और उनके उत्तराधिकार को लेकर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) पहले से ही अपनी पैठ बनाने की फिराक में है। चीन सरकार ने अपनी एक प्रशासनिक अधिसूचना जारी कर यह दावा किया है कि अगला दलाई लामा बीजिंग की स्वीकृति और पारंपरिक ‘गोल्डन अर्बन’ पद्धति के माध्यम से ही चुना जाना चाहिए, जिसे तिब्बती निर्वासित सरकार और दुनिया भर के बौद्ध अनुयायी पूरी तरह से खारिज करते हैं। ऐतिहासिक रूप से चीन का तिब्बत पर कब्जा एक विवादास्पद भू-राजनीतिक मुद्दा रहा है, जहां सांस्कृतिक क्रांति के दौरान हजारों मठों को नष्ट कर दिया गया था और तिब्बती लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता को सुनियोजित तरीके से दबाने का प्रयास किया गया।

प्रभाव और दूरगामी परिणाम (Impact Analysis)

इस विवाद के केवल धार्मिक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक और पर्यावरणीय परिणाम भी बेहद दूरगामी हैं। तिब्बत को ‘एशिया का जल मीनार’ (Water Tower of Asia) कहा जाता है, जहाँ से ब्रह्मपुत्र, मेकांग, यांग्त्ज़ी और सिंधु जैसी प्रमुख नदियाँ निकलती हैं। चीन द्वारा तिब्बती पठार पर बड़े पैमाने पर बांध निर्माण और जल प्रबंधन की अनियंत्रित गतिविधियाँ निचले देशों जैसे भारत, बांग्लादेश और दक्षिण-पूर्व एशिया की जल सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट पैदा कर रही हैं। इसके अलावा, यदि चीन उत्तराधिकार प्रक्रिया पर कब्जा करने में सफल हो जाता है, तो यह वैश्विक स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता और तानाशाही ताकतों की बड़ी वैचारिक जीत होगी, जो लोकतांत्रिक देशों के लिए भी खतरे की घंटी है।

चीन तिब्बत की पहचान को मिटाने के लिए ‘धीमी मौत’ की रणनीति अपना रहा है, लेकिन तिब्बतियों का आंतरिक लचीलापन और उनकी अटूट आस्था बीजिंग के हर दमनकारी षड्यंत्र को विफल करने में पूरी तरह सक्षम है।

अंतिम निष्कर्ष (Final Takeaway)

शिक्योंग पेनपा त्सेरिंग का यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र बनाम अधिनायकवाद की वैचारिक लड़ाई तेज हो गई है। तिब्बती निर्वासित नेतृत्व द्वारा ‘मध्य मार्ग दृष्टिकोण’ (Middle Way Approach) के जरिए वास्तविक स्वायत्तता की मांग करना और दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों से कूटनीतिक समर्थन जुटाना इस बात का प्रमाण है कि तिब्बत का मुद्दा केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता का प्रतीक बन चुका है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को अब चीन की विस्तारवादी और दमनकारी नीतियों के खिलाफ ठोस कदम उठाने की सख्त जरूरत है ताकि प्राचीन तिब्बती संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं को बचाया जा सके।

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