चंडीगढ़। राजवीर दीक्षित
(High Court Clarifies Pension Eligibility Rules)पेंशन से जुड़े मामलों में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का यह ताज़ा फैसला सरकारी कर्मचारियों और पूर्व सैनिकों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। हाईकोर्ट ने अपने स्पष्ट और दो-टूक फैसले में कहा है कि केवल लंबे समय तक सेवा देने भर से किसी कर्मचारी को पेंशन का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने साफ किया कि पेंशन कोई पुरस्कार या इनाम नहीं, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया और लागू सेवा नियमों के तहत मिलने वाला एक वैधानिक लाभ है।
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यह अहम टिप्पणी जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी ने सिविल पुनर्नियुक्ति के आधार पर पेंशन की मांग की थी। याचिकाकर्ता को पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (पीएसईआरसी) में अस्थायी पद पर नियुक्त किया गया था, लेकिन सेवा अवधि पूरी होने के बाद उन्हें पेंशन, ग्रेच्युटी और लीव इनकैशमेंट जैसे लाभ नहीं दिए गए थे।
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लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) अशोक ने दलील दी कि उन्होंने आयोग में 12 वर्षों से अधिक समय तक लगातार सेवा दी है और इसलिए वे पंजाब सिविल सर्विसेज नियमों के तहत पेंशन के हकदार हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि उनकी नियुक्ति अस्थायी और पुनर्नियुक्ति के आधार पर थी, जो पेंशन के वैधानिक अधिकार को जन्म नहीं देती।
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अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि नियुक्ति पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि यह पद अस्थायी है और किसी भी समय समाप्त किया जा सकता है। इसके अलावा, वर्ष 2015 में अधिसूचित सेवा नियमों में यह भी साफ कर दिया गया था कि आयोग में सभी नियुक्तियां केवल प्रतिनियुक्ति, पुनर्नियुक्ति या अनुबंध के आधार पर होंगी और इनमें पेंशन संबंधी लाभ शामिल नहीं होंगे।
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इस फैसले को भविष्य में पेंशन से जुड़े विवादों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जिससे यह साफ संदेश जाता है कि पेंशन का अधिकार तभी बनता है जब सेवा नियम और शर्तें इसकी अनुमति दें।





















