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Pulwama Attack: 7 साल बाद भी जिंदा है वो दर्द, जिसने बदला भारत का रुख

नई दिल्ली। राजवीर दीक्षित
(Pulwama: Seven Years On, A Nation Remembers)14 फरवरी 2019 का दिन भारत के इतिहास में हमेशा एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाएगा। जम्मू से श्रीनगर जा रहे सीआरपीएफ के काफिले पर दक्षिण कश्मीर के लेथपोरा में हुए आत्मघाती हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। विस्फोटकों से भरी गाड़ी सुरक्षा बलों की बस से टकराई और 40 जवान शहीद हो गए। यह केवल आतंकी हमला नहीं था, बल्कि देश की सुरक्षा सोच को बदलने वाला निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

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हमले के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की जांच में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद की साजिश सामने आई। सीमा पार से लाए गए RDX और स्थानीय नेटवर्क की मदद से इस हमले को अंजाम दिया गया था। खुलासों के बाद देशभर में आक्रोश फैल गया और कड़े जवाब की मांग तेज हो गई।
पुलवामा के 12 दिन बाद भारत ने बालाकोट एयरस्ट्राइक कर आतंक के खिलाफ नई रणनीति का संकेत दिया। भारतीय वायुसेना के मिराज-2000 विमानों ने नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकी ठिकानों पर हमला किया। इसे भारत की रक्षा नीति में बड़ा बदलाव माना गया, जहां पहली बार सीमा पार जाकर हवाई कार्रवाई की गई। अगले दिन भारत-पाक के बीच हवाई तनाव बढ़ा और विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान की गिरफ्तारी व सुरक्षित वापसी ने हालात की गंभीरता को उजागर किया।

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सैन्य कार्रवाई के साथ भारत ने कूटनीतिक मोर्चे पर भी कदम उठाए। पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वापस लिया गया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकी फंडिंग के खिलाफ दबाव बढ़ाया गया। FATF की ग्रे लिस्ट में पाकिस्तान का शामिल होना और मसूद अजहर का वैश्विक आतंकी घोषित होना बड़ी उपलब्धि मानी गई।

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पुलवामा के बाद जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा काफिलों के प्रोटोकॉल बदले, हवाई परिवहन बढ़ा, स्मार्ट फेंसिंग और ड्रोन निगरानी तेज हुई। आज लेथपोरा स्मारक पर हर साल शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है। सात साल बाद भी पुलवामा भारत के संकल्प, सुरक्षा नीति और आतंक के खिलाफ कठोर रुख का प्रतीक बना हुआ है।

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