दिल्ली | राजवीर दीक्षित
(Threat of Drug Crisis: Rising Prices and Shortages) मध्य-पूर्व में जारी युद्ध का असर अब भारत के फार्मा सेक्टर पर साफ दिखाई देने लगा है। दवाइयों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित होने से न केवल दवाओं की कमी बढ़ रही है, बल्कि उनकी कीमतों में भी भारी उछाल देखने को मिल रहा है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले पैरासिटामोल जैसे एपीआई की कीमत सिर्फ 15 दिनों में लगभग दोगुनी हो गई है।
फार्मा कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्चे माल की उपलब्धता और बढ़ती लागत है। ग्लिसरीन, आइसोप्रोपाइल अल्कोहल और सोर्बिटोल जैसे सॉल्वेंट्स की कीमतों में 50% तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके अलावा दवाइयों की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले एलडीपीई और एचडीपीई ग्रैन्यूल्स की भी भारी कमी दर्ज की गई है, जिससे उत्पादन और महंगा हो गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, देश में मौजूद कई एपीआई निर्माता कंपनियों ने उत्पादन घटा दिया है या अस्थायी रूप से बंद कर दिया है, जिससे दवाइयों की सप्लाई चेन कमजोर हो रही है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो बाजार में जरूरी दवाओं की भारी किल्लत हो सकती है।
सिर्फ एलोपैथिक ही नहीं, आयुर्वेदिक दवाओं के कच्चे माल की कीमतों में भी तेजी आई है। खासकर ईरान से आने वाले माल की सप्लाई बाधित होने के कारण दिक्कतें और बढ़ गई हैं। पैकेजिंग से जुड़े सामान जैसे पीईटी बोतलें और ग्लास वायल्स भी महंगे हो गए हैं।
इस संकट को देखते हुए उद्योग से जुड़े लोगों ने सरकार से अपील की है कि कालाबाजारी पर सख्त कार्रवाई की जाए और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आम जनता को दवाओं के लिए बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।



















