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कोर्ट में 6,700 बुजुर्गों को इंसाफ का इंतजार, 90 साल के व्यक्ति की 22 पेशियां

चंडीगढ़। राजवीर दीक्षित 

 

(6,700 elderly people await justice in court; 90-year-old man has attended 22 hearings) उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी हजारों बुजुर्ग अदालतों में न्याय का इंतजार कर रहे हैं। चंडीगढ़ की जिला अदालतों में वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े 6,700 मामले लंबित हैं। इनमें 4,736 दीवानी और 1,964 आपराधिक मामले शामिल हैं। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के आंकड़ों के अनुसार, ये मामले अदालतों में लंबित कुल मामलों का करीब 7 प्रतिशत हैं।

90 साल की उम्र में भी अदालत के चक्कर

चंडीगढ़ के सेक्टर-4 स्थित मकान से जुड़े संपत्ति विवाद में 90 वर्षीय नृपेंद्र नाथ अग्रवाल को अब तक फैसले का इंतजार है। उन्होंने वर्ष 2024 में दीवानी मुकदमा दायर किया था। इसके बाद 22 सुनवाइयां हो चुकी हैं, लेकिन विवाद का निपटारा नहीं हुआ है। मामले में 25 सितंबर को पिछला आदेश जारी हुआ था, जबकि अगली सुनवाई 19 अक्टूबर को निर्धारित है।

यह मामला बुजुर्गों के लिए न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली देरी की चुनौती को सामने लाता है। उम्र के इस पड़ाव पर लंबे समय तक मुकदमे का अनिश्चित बने रहना संबंधित पक्षों के लिए परेशानी बढ़ा सकता है।

चंडीगढ़ की अदालतों में 98,733 केस लंबित

आंकड़ों के मुताबिक, चंडीगढ़ की जिला अदालतों में कुल 98,733 मामले लंबित हैं। इनमें 24,287 दीवानी मामले हैं। इनमें से 12,225 मामले एक साल से अधिक समय से लंबित हैं। ये आंकड़े न्यायिक व्यवस्था के सामने लंबित मामलों के जल्द निपटारे की चुनौती को दर्शाते हैं।

86 साल से अधिक उम्र वालों को प्राथमिकता

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के रोस्टर में 86 वर्ष या उससे अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों के मामलों को अर्जेंट मोशन कॉज लिस्ट में शामिल करने का प्रावधान है। इसका उद्देश्य अत्यधिक उम्र के कारण विशेष रूप से प्रभावित हो सकने वाले पक्षकारों के मामलों को सुनवाई में प्राथमिकता देना है।

हालांकि, प्राथमिकता का अर्थ किसी पक्ष के पक्ष में फैसला देना नहीं है। अदालत को दोनों पक्षों को सुनने और कानूनी प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्णय करना होता है।

सुप्रीम कोर्ट भी बता चुका है न्याय तक पहुंच का महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने अनीता कुशवाहा बनाम पुष्पा सुदान मामले में न्याय तक पहुंच को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से जुड़ा अधिकार माना था। अदालत ने कहा था कि अत्यधिक देरी न्याय पाने के अधिकार को कमजोर कर सकती है। वहीं, डॉ. अश्विनी कुमार बनाम भारत संघ मामले में भी वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों और कल्याण से जुड़े संवैधानिक पहलुओं पर विचार किया गया था।

बुजुर्गों के लंबित मामलों का जल्द निपटारा केवल सुविधा का सवाल नहीं, बल्कि न्याय को समय पर प्रभावी बनाने की जरूरत भी है। किसी मुकदमे का फैसला किसी भी पक्ष के पक्ष में हो सकता है, लेकिन अनावश्यक देरी से बचना जरूरी है, ताकि न्याय पाने का अधिकार व्यावहारिक रूप से सार्थक बना रहे।

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