बद्दी । राजवीर दीक्षित
हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में स्थित 3,256 हेक्टेयर क्षेत्र वाले बद्दी माइक्रो-वॉटरशेड के विस्तृत अध्ययन में औद्योगिक विस्तार के गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार, बद्दी औद्योगिक क्षेत्र के तेजी से विस्तार की भारी कीमत आसपास के गांवों को चुकानी पड़ रही है। इससे भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, पारंपरिक खेती प्रभावित हुई है और जहरीला औद्योगिक अपशिष्ट सिरसा खड्ड में पहुंच रहा है, जो आगे पंजाब के रोपड़ रामसर वेटलैंड में जाकर मिलता है।
ये निष्कर्ष ऐसे समय सामने आए हैं, जब पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) ने हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर सिरसा खड्ड में औद्योगिक और अन्य जहरीले कचरे से हो रहे व्यापक प्रदूषण पर चिंता जताई है। यह प्रदूषित पानी अंततः पंजाब में सतलुज नदी तक पहुंचता है।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के एक क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र के पूर्व निदेशक डॉ. एस.एस. ग्रेवाल द्वारा किए गए इस अध्ययन में 21 गांवों और करीब 12,000 लोगों को शामिल किया गया है। रिपोर्ट में औद्योगिक विस्तार और पर्यावरण के साथ-साथ ग्रामीण आजीविका के बीच बढ़ते टकराव की गंभीर तस्वीर सामने आई है।
अध्ययन के मुताबिक, गहरे औद्योगिक बोरवेल और सरकारी ट्यूबवेल, जिनमें से कई बारहमासी जल निकासी वाली धाराओं के किनारे लगाए गए हैं, प्राकृतिक पुनर्भरण की तुलना में कहीं अधिक तेजी से भूजल निकाल रहे हैं। पिछले 15 वर्षों में किसानों के कृषि बोरवेल में पानी का स्तर 8 से 25 मीटर तक नीचे चला गया है। सर्वेक्षण किए गए 55 कृषि ट्यूबवेलों में से कई सूख चुके हैं, जबकि कुछ को अब अधिक गहरे पाइप और ज्यादा हॉर्सपावर वाली मोटरों की जरूरत पड़ रही है।
वार्षिक जल संतुलन के आकलन के अनुसार, करीब 1,014 हेक्टेयर-मीटर पानी का पुनर्भरण होता है, जबकि कुल निकासी लगभग 1,278 हेक्टेयर-मीटर है। यानी करीब 264 हेक्टेयर-मीटर पानी की कमी सामने आई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि किसान अपने कुओं को चालू रखने के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं। दसौरा, कोटला और झाड़ माजरा जैसे गांवों में भूजल स्तर में तेज गिरावट दर्ज की गई है।
सिरसा खड्ड में जहरीला औद्योगिक पानी
प्रदूषण के संबंध में अध्ययन में बताया गया है कि कोटला चो और अन्य जल निकासी धाराओं से निकलने वाला काला और दुर्गंधयुक्त पानी बालड़ नदी में पहुंचता है और फिर सिरसा खड्ड में चला जाता है। इस पानी में आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम, निकेल और बेरियम जैसी भारी धातुएं भी पाई गई हैं।
अध्ययन में स्थानीय अनुमानों का हवाला देते हुए कहा गया है कि औद्योगिक अपशिष्ट का मुश्किल से 10 प्रतिशत ही उचित तरीके से उपचारित किया जाता है। कई फैक्ट्रियों के बाहर लगे प्रदूषण नियंत्रण संबंधी डिस्प्ले बोर्ड भी खाली पाए गए।
इस प्रदूषण को रोपड़ रामसर साइट में मछलियों के मरने और प्रवासी पक्षियों की मौत से भी जोड़ा गया है। यह मुद्दा पहले भी हिमाचल प्रदेश और पंजाब के बीच चिंता का विषय रहा है।
पारंपरिक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
औद्योगिक विस्तार ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बदल दिया है। दालों, तिलहन और मक्का-गेहूं की पारंपरिक खेती में कमी आई है। कई परिवारों ने अपनी जमीन औद्योगिक इकाइयों को बेच दी है, जबकि कुछ ने प्रवासी श्रमिकों के लिए किराये के मकान बनाए हैं। वहीं कई परिवार पानी के टैंकर और परिवहन व्यवसाय की ओर चले गए हैं।
उद्योग बढ़ने के बावजूद स्थानीय लोगों के लिए फैक्ट्रियों में रोजगार सीमित बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ औद्योगिक इकाइयां यूनियन बनाने की संभावनाओं से बचने के लिए स्थानीय लोगों की जगह बाहर से श्रमिकों को प्राथमिकता देती हैं। पर्याप्त पशु चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में पशुपालन भी कम हुआ है।
भूजल बचाने और प्रदूषण रोकने की सिफारिश
अध्ययन में कोटला चो के पानी को वेटिवर घास (खस घास) की मदद से फाइटोरिमेडिएशन तकनीक द्वारा साफ करने की सिफारिश की गई है। उपचारित पानी का इस्तेमाल प्रस्तावित ग्रीन बेल्ट और पार्क के लिए करने का सुझाव दिया गया है।
इसके अलावा भूजल पुनर्भरण बढ़ाने के लिए मिट्टी के बांध और चेक डैम बनाने, वनस्पति अवरोध विकसित करने, जलधाराओं के किनारों की सुरक्षा करने और पुराने तालाबों के जीर्णोद्धार की सिफारिश की गई है।













