thetargetnews.in ब्यूरो: पंजाब सरकार की महत्वाकांक्षी ‘स्कूल ऑफ हैप्पीनेस’ परियोजना अपनी घोषणा के दो साल बाद भी कछुआ चाल से चल रही है। शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने के दावे के साथ शुरू की गई इस योजना के तहत 35 स्कूलों का चयन किया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अब तक केवल 4 स्कूल ही पूरी तरह से तैयार हो पाए हैं। इस देरी के पीछे मुख्य कारण फंड की कमी और प्रशासनिक सुस्ती को माना जा रहा है।
परियोजना की सुस्त रफ्तार और वित्तीय संकट
राज्य सरकार ने प्रत्येक ‘स्कूल ऑफ हैप्पीनेस’ के लिए 40 लाख रुपये से अधिक का बजट आवंटित किया था। इस राशि का उद्देश्य स्कूलों में आधुनिक बुनियादी ढांचा, खेलकूद की सुविधाएं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देना था। हालांकि, फंड जारी करने में हो रही देरी ने निर्माण कार्यों की गति को पूरी तरह से रोक दिया है। कई जिलों में ठेकेदारों ने भुगतान न मिलने के कारण काम बीच में ही छोड़ दिया है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ और अधिकारी
शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि फंड की किल्लत के कारण प्रोजेक्ट की समय-सीमा बार-बार बढ़ानी पड़ रही है। हम जल्द ही लंबित भुगतान जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर रहे हैं ताकि शेष 31 स्कूलों का काम जल्द पूरा हो सके।
मुख्य बिंदु और चिंताएं
- 35 प्रस्तावित स्कूलों में से फिलहाल केवल 4 स्कूलों का ही कायाकल्प हो पाया है।
- प्रत्येक स्कूल के लिए 40 लाख रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया था।
- फंड के अभाव में निर्माण कार्य की गति धीमी पड़ी है, जिससे छात्रों को नुकसान हो रहा है।
- अभिभावकों में सरकारी दावों को लेकर अब निराशा और सवाल उठने लगे हैं।
भविष्य की राह
शिक्षाविदों का मानना है कि केवल बजट आवंटित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके सही समय पर उपयोग की निगरानी भी जरूरी है। यदि सरकार ने जल्द ही इन स्कूलों के निर्माण में तेजी नहीं दिखाई, तो यह योजना केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगी। राज्य के शिक्षा मंत्री ने हाल ही में समीक्षा बैठक के दौरान अधिकारियों को काम में तेजी लाने के सख्त निर्देश दिए हैं, लेकिन देखना यह होगा कि यह निर्देश धरातल पर कब तक उतरते हैं।



















