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एनएचएआई सड़क परियोजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, पंजाब सरकार से माँगा वनीकरण का प्रस्ताव

एनएचएआई सड़क परियोजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, पंजाब सरकार से माँगा वनीकरण का प्रस्ताव

टारगेट न्यूज़ विशेष कवरेज: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पंजाब सरकार को राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की सड़क निर्माण परियोजनाओं के लिए क्षतिपूरक वनीकरण हेतु पर्याप्त भूमि उपलब्ध कराने का एक व्यापक प्रस्ताव प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। यह मामला पंजाब में घटते वनीकरण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा है, जिस पर देश की सर्वोच्च अदालत ने गहरी चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि राज्य में पर्यावरण संतुलन बनाए रखना और बुनियादी ढांचे का विकास दोनों ही बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसके लिए कानूनी और पर्यावरणीय नियमों का पालन अनिवार्य रूप से होना चाहिए। अदालत ने इस मामले में पंजाब सरकार को 27 नवंबर तक अपना जवाब दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया है, ताकि सड़क परियोजनाओं के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक सही संतुलन स्थापित किया जा सके।

प्रमुख आकर्षण और बिंदु (Highlights)

  • सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को एनएचएआई की सड़क परियोजनाओं के लिए क्षतिपूरक वनीकरण हेतु भूमि प्रस्ताव देने का निर्देश दिया।
  • पीठ ने पंजाब में कम होते वन आवरण और वनीकरण योजनाओं के क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं पर चिंता जताई।
  • शीर्ष अदालत ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली एनएचएआई की याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें पेड़ों की कटाई पर रोक लगाई गई थी।
  • सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि उच्च न्यायालय के आदेशों के कारण रणनीतिक और सार्वजनिक महत्व की कई महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाएं रुकी हुई हैं।
  • अदालत ने यह भी सवाल किया कि क्या काटे जाने वाले पेड़ों के पांच किलोमीटर के दायरे में ही वनीकरण के लिए भूमि आवंटित की जा रही है।

पूरे घटनाक्रम की कहानी (Full Story)

यह पूरा कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पंजाब राज्य में तेजी से घटते वन आवरण को लेकर गंभीर चिंता जताई। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि पंजाब का कुल भौगोलिक क्षेत्र का वन आवरण मात्र 3.67 प्रतिशत है, जो कि पड़ोसी राज्य राजस्थान के 4.87 प्रतिशत वन आवरण से भी काफी कम है। इस गंभीर स्थिति को संज्ञान में लेते हुए उच्च न्यायालय ने जिरकपुर बाईपास परियोजना और अन्य विकास कार्यों के तहत पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी थी, जिससे एनएचएआई की कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं प्रभावित होने लगीं।

एनएचएआई की तरफ से पेश हुए सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय में दलील दी कि उच्च न्यायालय द्वारा जारी किया गया निरंतर आदेश सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के विकास में बहुत बड़ी बाधा बन रहा है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर प्रकाश डाला कि पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है, जहाँ देश की सुरक्षा और रणनीतिक आवश्यकताओं के लिए सड़कों का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। इसके अलावा, उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि एनएचएआई कानून द्वारा अनिवार्य क्षतिपूरक वनीकरण के नियमों का पूरी तरह से पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है।

सर्वोच्च अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनने के बाद पंजाब सरकार को निर्देश दिया कि वह एक ठोस योजना तैयार करे जिसके तहत एनएचएआई द्वारा सड़क निर्माण के लिए जहाँ भी भूमि की आवश्यकता है, उसके एवज में क्षतिपूरक वनीकरण के लिए तुरंत उपयुक्त भूमि की व्यवस्था की जा सके। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण को बचाना जितना जरूरी है, उतना ही देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना भी आवश्यक है।

मुख्य सवाल और उनके जवाब (Key Questions & Answers)

सवाल 1: सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को क्या निर्देश दिया है?
जवाब: सर्वोच्च अदालत ने पंजाब सरकार को निर्देश दिया है कि वह एनएचएआई द्वारा सड़क निर्माण परियोजनाओं के लिए जहाँ भी भूमि की आवश्यकता है, वहाँ क्षतिपूरक वनीकरण के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध कराने का प्रस्ताव प्रस्तुत करे।

सवाल 2: उच्च न्यायालय ने पेड़ों की कटाई पर रोक क्यों लगाई थी?
जवाब: उच्च न्यायालय ने पंजाब में चिंताजनक रूप से घटते वन आवरण (जो कि भौगोलिक क्षेत्र का मात्र 3.67 प्रतिशत है) को देखते हुए एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह रोक लगाई थी।

सवाल 3: एनएचएआई की मुख्य दलील क्या थी?
जवाब: एनएचएआई की ओर से सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि पंजाब एक सीमावर्ती और सामरिक दृष्टि से संवेदनशील राज्य है, जहाँ सड़कों का निर्माण जरूरी है और उच्च न्यायालय के प्रतिबंधों के कारण सार्वजनिक परियोजनाएं ठप हो रही हैं।

सड़क निर्माण और पर्यावरण संरक्षण देश के दो सबसे अहम पहलू हैं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास कार्यों के साथ-साथ प्राकृतिक हरियाली से कोई समझौता न हो, और कानून के दायरे में रहकर ही सभी परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जाए।

समापन और निष्कर्ष (Conclusion)

यह न्यायिक हस्तक्षेप इस बात का प्रतीक है कि भारत में विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से जहाँ एक ओर पंजाब में रुकी हुई राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं को गति मिलने की उम्मीद जगी है, वहीं दूसरी ओर राज्य के गिरते वन आवरण को बचाने के लिए कड़े कदम उठाने का रास्ता भी साफ हुआ है। आने वाले समय में पंजाब सरकार द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला प्रस्ताव इस बात का निर्धारण करेगा कि राज्य में पर्यावरण और बुनियादी ढांचे का संतुलन किस प्रकार बैठाया जाता है।

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