नई दिल्ली। राजवीर दीक्षित
(Supreme Court takes a stern stance on ‘Talaq-e-Hasan’; seeks a response from the Centre) मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक की विभिन्न प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए एकसमान नियम बनाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अदालत में दायर जनहित याचिका (PIL) में तलाक-ए-हसन की वैधता को भी चुनौती दी गई है।
16 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने केंद्र सहित संबंधित पक्षों से याचिका पर अपना पक्ष रखने को कहा। इस मामले को तलाक-ए-हसन की वैधता को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका के साथ जोड़ दिया गया है।
क्या है तलाक-ए-हसन?
तलाक-ए-हसन मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तलाक की एक प्रक्रिया है। इसमें पति तीन महीने की अवधि में हर महीने एक बार तलाक कहता है। यदि इस दौरान पति-पत्नी के बीच साथ रहना दोबारा शुरू नहीं होता, तो तीसरी बार तलाक कहने के बाद विवाह-विच्छेद प्रभावी हो जाता है।
यदि पहली या दूसरी बार तलाक कहने के बाद दोनों फिर से साथ रहने लगते हैं, तो इसे सुलह माना जाता है।
याचिका में क्या मांग की गई?
याचिकाकर्ता ने तलाक-ए-हसन और अन्य एकतरफा, गैर-न्यायिक तलाक प्रक्रियाओं पर रोक लगाने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि विवाह-विच्छेद की प्रक्रिया में निष्पक्षता, पारदर्शिता और महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए।
याचिका में केंद्र से सभी तरह के तलाक के लिए एकसमान प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय और कानूनी रूप से लागू किए जा सकने वाले दिशानिर्देश बनाने की मांग भी की गई है।
इसके अलावा, तलाक से प्रभावित महिलाओं और उनके बच्चों के लिए आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई गई है।
बहुविवाह और दूसरी शादी पर भी सवाल
याचिका में मौजूदा पत्नी की स्वतंत्र, पूर्व और पूरी जानकारी के साथ दी गई सहमति के बिना दूसरी शादी करने के मामलों पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें बहुविवाह से जुड़े प्रावधानों की संवैधानिक वैधता की समीक्षा की मांग की गई है, खासकर महिलाओं की समानता, गरिमा और आर्थिक सुरक्षा के संदर्भ में।
याचिकाकर्ता ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 को भी चुनौती दी है, जहां तक इसे तलाक-ए-हसन को वैध मान्यता देने वाला बताया गया है।
2017 में ट्रिपल तलाक पर आया था ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में तत्काल तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। अदालत ने इसे मनमाना और महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना था।
अब तलाक-ए-हसन और तलाक की अन्य प्रक्रियाओं पर दायर याचिकाओं में महिलाओं के समानता और गरिमा के अधिकारों को लेकर बहस होगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है; तलाक-ए-हसन की वैधता पर अंतिम फैसला आना बाकी है।


















