टारगेट न्यूज़ विशेष कवरेज: हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक और पुलिस महकमे में उस वक्त हड़कंप मच गया जब शिमला के पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) संजीव कुमार गांधी के खिलाफ सरकारी धन के गबन, धोखाधड़ी और जाली दस्तावेज तैयार करने के गंभीर आरोपों में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई। यह मामला उनके कार्यकाल के दौरान वित्तीय अनियमितताओं और एक पुलिस कांस्टेबल के साथ धोखाधड़ी से जुड़ा है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र में भूचाल ला दिया है। पुलिस मुख्यालय से मिली जानकारी के अनुसार, वर्तमान में मामले की गहनता से जांच की जा रही है और वित्तीय रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।
प्रमुख आकर्षण और बिंदु (Highlights)
- शिमला के पूर्व एसएसपी संजीव कुमार गांधी पर 2.35 लाख रुपये के सरकारी फंड के गबन का आरोप है।
- कैथू पुलिस लाइंस में तैनात एक कांस्टेबल ने धोखाधड़ी और भुगतान न मिलने की आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई है।
- आरोप है कि फर्जी दस्तावेजों और धोखे से भुगतान वाउचर पर हस्ताक्षर करवाए गए, लेकिन राशि पीड़ित के खाते में नहीं आई।
- वर्तमान शिमला एसएसपी गौरव सिंह ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज कर लिया गया है।
- पूर्व एसएसपी संजीव गांधी का कहना है कि उन्हें इस एफआईआर के संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है।
पूरे घटनाक्रम की कहानी (Full Story)
यह पूरा मामला साल 2024 और 2025 के दौरान का है, जब संजीव कुमार गांधी शिमला जिले में एसएसपी के पद पर तैनात थे। इस अवधि में पुलिस लाइंस कैथू में तैनात एक कांस्टेबल ने पुलिस अधिकारियों को दी गई अपनी लिखित शिकायत में सनसनीखेज खुलासे किए हैं। पीड़ित कांस्टेबल के अनुसार, उसे आधिकारिक कार्यों और व्यवस्थाओं को पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस दौरान उसे निर्देश दिए गए थे कि वह अपने व्यक्तिगत फंड का इस्तेमाल कर सरकारी काम पूरा करे और बाद में खर्च की गई राशि उसे लौटा दी जाएगी। कांस्टेबल ने निर्देशों का पालन करते हुए अपने निजी बैंक खाते से कुल 1,87,890 रुपये की व्यवस्था की और सभी संबंधित बिल और दस्तावेज कार्यालय में जमा करवा दिए, जिन्हें जांच के बाद भुगतान के लिए स्वीकृत भी कर लिया गया था।
शिकायतकर्ता ने आगे आरोप लगाया कि 6 फरवरी 2026 को तत्कालीन एसएसपी संजीव गांधी ने उसे अपने कार्यालय में बुलाया और धोखे से एक भुगतान वाउचर पर उसके हस्ताक्षर ले लिए। कांस्टेबल को यह कहकर विश्वास दिलाया गया कि यह हस्ताक्षर भुगतान प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अनिवार्य हैं और इसके तुरंत बाद स्वीकृत राशि उसे मिल जाएगी। हालांकि, हस्ताक्षर करवाने के बाद भी उसे कोई पैसा नहीं दिया गया। जब पीड़ित ने जुलाई 2026 में इस संबंध में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई और लेखा शाखा (Accounts Branch) से जानकारी जुटाई, तो चौंकाने वाला सच सामने आया। पता चला कि फंड से स्वीकृत राशि निकाली जा चुकी थी, लेकिन वह कभी कांस्टेबल के खाते में जमा ही नहीं हुई थी। इस धांधली के कारण कांस्टेबल को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा और उसे अपने निजी स्रोतों से कर्ज चुकाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी।
वर्तमान शिमला एसएसपी गौरव सिंह ने इस मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि पुलिस विभाग ने त्वरित कार्रवाई करते हुए वित्तीय रिकॉर्डों की गहन जांच की है। जांच में यह सामने आया कि लगभग दो वर्षों की अवधि के दौरान जिला पुलिस फंड से कुल 2,35,000 रुपये अवैध रूप से निकाले गए थे। तत्कालीन एसएसपी इन फंडों के उपयोग का कोई संतोषजनक हिसाब या रिकॉर्ड पेश नहीं कर सके, जिससे फंड में भारी कमी पाई गई। रिकॉर्ड के मुताबिक, जब इस साल फरवरी में संजीव गांधी का तबादला कार्मिक विभाग में हुआ, तो फंड की इस कमी को छिपाने के लिए उन्होंने जल्दबाजी में कांस्टेबल के बिलों की स्वीकृत राशि को संबंधित फंड खाते में ट्रांसफर कर दिया, जिससे कांस्टेबल को उसकी वैध राशि से वंचित होना पड़ा।
मुख्य सवाल और उनके जवाब (Key Questions & Answers)
सवाल 1: पूर्व एसएसपी संजीव गांधी पर मुख्य रूप से क्या आरोप लगाए गए हैं?
जवाब: उन पर लगभग 2.35 लाख रुपये के सरकारी फंड के गबन, वित्तीय रिकॉर्ड में हेराफेरी, जाली दस्तावेज तैयार करने और एक पुलिस कांस्टेबल के साथ धोखाधड़ी करने का आरोप है।
सवाल 2: वर्तमान में इस मामले में क्या कानूनी कार्रवाई की गई है?
जवाब: शिमला के वर्तमान पुलिस अधीक्षक गौरव सिंह के अनुसार, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 316(5), 314, 318, 336 और 340 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है और आगे की जांच जारी है।
सवाल 3: आरोपी पूर्व अधिकारी का इस मामले पर क्या कहना है?
जवाब: मीडिया और जांचकर्ताओं द्वारा संपर्क किए जाने पर पूर्व एसएसपी संजीव गांधी ने स्पष्ट किया कि उन्हें इस प्राथमिकी (FIR) के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है।
शिमला पुलिस के आधिकारिक बयान के अनुसार, ‘वित्तीय रिकॉर्ड की जांच से पता चला कि जिला पुलिस फंड से अवैध रूप से 2.35 लाख रुपये निकाले गए और पूर्व एसएसपी फंड के उपयोग का हिसाब देने में असमर्थ रहे, जिसके बाद कानूनी कार्रवाई शुरू की गई है।’
समापन और निष्कर्ष (Conclusion)
हिमाचल प्रदेश पुलिस विभाग के भीतर इस स्तर की वित्तीय अनियमितता और एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पर लगे धोखाधड़ी के आरोप बेहद गंभीर विषय हैं। यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के समक्ष हर व्यक्ति की समानता को रेखांकित करता है। पुलिस विभाग द्वारा निष्पक्ष और त्वरित जांच के आदेश दिए जाने से यह उम्मीद बंधती है कि इस मामले में सच्चाई सामने आएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। राज्य में इस उच्चस्तरीय प्रकरण की गूंज हर तरफ सुनाई दे रही है और प्रशासनिक गलियारों में इसकी कड़ी चर्चा हो रही है।


















