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पंजाब में गरमाया विनिवेश मामला: 2027 के चुनावों से पहले पंजाब अल्काइल एंड केमिकल्स लिमिटेड की बिक्री पर ईडी जांच की मांग

पंजाब में गरमाया विनिवेश मामला: 2027 के चुनावों से पहले पंजाब अल्काइल एंड केमिकल्स लिमिटेड की बिक्री पर ईडी जांच की मांग

टारगेट न्यूज़ ग्राउंड रिपोर्ट: पंजाब की राजनीति में एक बार फिर से बड़ा भूचाल आता दिख रहा है, जहां साल 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एक पुराना और संवेदनशील औद्योगिक विनिवेश मामला पूरी तरह से गरमा गया है। नांगल स्थित सरकारी औद्योगिक उपक्रम ‘पंजाब अल्काइल एंड केमिकल्स लिमिटेड’ (जिसे अब Primo Chemicals के नाम से जाना जाता है) की बिक्री को लेकर राज्य में सियासी पारा चढ़ने लगा है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष सुभाष शर्मा ने सितंबर 2020 में कांग्रेस शासनकाल के दौरान राज्य सरकार द्वारा इस कंपनी में अपनी शेयरधारिता के विनिवेश की प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी से उच्चस्तरीय जांच कराने की औपचारिक मांग की है। इस गंभीर मांग के सामने आने के बाद से राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।

ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)

  • पंजाब सरकार ने सितंबर 2020 में अपनी पूरी 33.49 फीसदी हिस्सेदारी मात्र 40.98 करोड़ रुपये में बेच दी थी।
  • भाजपा नेता सुभाष शर्मा ने इस बिक्री में वित्तीय अनियमितताओं की आशंका जताते हुए ईडी के निदेशक को लिखित शिकायत सौंपी है।
  • विनिवेश प्रक्रिया से कुछ ही महीने पहले कंपनी द्वारा छत्तीसगढ़ में लगभग 40 करोड़ रुपये में 70 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट खरीदा गया था।
  • चंडीगढ़ स्थित कमर्शियल ऑफिस और नांगल में 88.86 एकड़ से अधिक जमीन सहित अन्य अचल संपत्तियों के मूल्यांकन पर बड़े सवाल खड़े किए गए हैं।

घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)

यह पूरा मामला सितंबर 2020 का है, जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान पंजाब स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन (PSIDC) के पास मौजूद पंजाब अल्काइल एंड केमिकल्स लिमिटेड की 33.49 प्रतिशत शेयरधारिता को खुले बाजार में बेच दिया गया था। उस समय सरकार को इस पूरी हिस्सेदारी के एवज में 40.98 करोड़ रुपये मिले थे। हालांकि, समय-समय पर इस सौदे की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। हाल ही में आरटीआई के माध्यम से सामने आए दस्तावेजों और कंपनी की वार्षिक रिपोर्टों के आधार पर इस मामले को एक नया मोड़ मिला है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, जिस कंपनी की शेयरधारिता को महज 40.98 करोड़ रुपये में बेचा गया, उसने बिक्री से कुछ ही महीने पहले छत्तीसगढ़ में लगभग 40 करोड़ रुपये की लागत से एक 70 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट अधिग्रहित किया था। इसके अलावा, चंडीगढ़ के पॉश इलाके में स्थित कंपनी के कमर्शियल ऑफिस की अनुमानित कीमत ही अकेले करीब 60 करोड़ रुपये आंकी गई है। इसके साथ ही नांगल में स्थित लगभग 88.86 एकड़ बेशकीमती फैक्ट्री भूमि, भारी-भरकम मशीनरी और औद्योगिक बुनियादी ढांचे के मूल्यांकन को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

सुभाष शर्मा ने अपनी शिकायत में कहा है कि तत्कालीन सरकार ने पानी के भाव पर सरकारी संपत्ति को बेचकर बड़ा नुकसान पहुंचाया है। इस पूरे सौदे की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इसमें किस स्तर पर वित्तीय हेरफेर हुआ था।

प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)

इस विनिवेश विवाद का राजनीतिक इतिहास भी काफी पुराना है। जब पिछला विधानसभा चुनाव नजदीक था, तब आम आदमी पार्टी ने भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था और तत्कालीन सरकारों पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि, सत्ता परिवर्तन के बाद वर्तमान सरकार की तरफ से इस मामले में अभी तक किसी भी प्रकार की आधिकारिक जांच के आदेश नहीं दिए गए हैं, जिससे विपक्षी दलों को सरकार पर सवाल उठाने का एक और मौका मिल गया है। अब भाजपा के इस कदम के बाद जनता और स्थानीय उद्योगों से जुड़े लोगों के बीच भी चर्चाएं तेज हो गई हैं कि क्या इस बहुचर्चित मामले में केंद्रीय एजेंसियां हस्तक्षेप करेंगी या नहीं।

आगे क्या? (What Lies Ahead)

आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह मुद्दा पंजाब की सियासत में एक बड़ा हथियार बनता जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) के समक्ष प्रस्तुत आवेदन में यह मांग की गई है कि इस सौदे की पूरी ट्रांजैक्शन एडवाइजर रिपोर्ट, रिजर्व प्राइस, टेंडर की शर्तें, प्रतिस्पर्धी बोलियों और तमाम मंजूरियों की गहराई से समीक्षा की जाए। इसके साथ ही वित्तीय ट्रेल की जांच कर यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि क्या इस प्रक्रिया में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं। आने वाले दिनों में यह मामला राज्य की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

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