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हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही है बर्फ के टूटने और हिमस्खलन की घटनाएं, नए अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा

हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही है बर्फ के टूटने और हिमस्खलन की घटनाएं, नए अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा

टारगेट न्यूज़ की विशेष रिपोर्ट: जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब दुनिया की छत कहे जाने वाले हिमालयी क्षेत्रों और एशिया के उच्च पर्वतीय इलाकों (HMA) पर बेहद खतरनाक रूप से दिखने लगा है। हाल ही में नेपाल और चीन के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक व्यापक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि इन क्षेत्रों में बर्फ के हिमस्खलन (Ice Avalanches) की आवृत्ति यानी बारंबारता और उनका दायरा दोनों ही तेजी से बढ़ रहे हैं। इस स्थिति के कारण पर्वतीय समुदायों, परिवहन मार्गों और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के सामने गंभीर जोखिम उत्पन्न हो गया है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में इसके विनाशकारी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

घटना की गहराई और प्रमुख पहलू (Deep Breakdown)

  • शोधकर्ताओं ने 1900 से 2024 के बीच HMA क्षेत्र में हुई 137 बर्फ से जुड़ी हिमस्खलन की घटनाओं का एक विस्तृत डेटाबेस तैयार किया है।
  • इन घटनाओं को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: शुद्ध बर्फ हिमस्खलन, बर्फ-चट्टान हिमस्खलन (Ice-Rock Avalanches) और ग्लेशियर का ढहना।
  • इनमें से ‘बर्फ-चट्टान हिमस्खलन’ सबसे आम और खतरनाक पाए गए हैं, जो ढलान वाले इलाकों में ज्यादा तबाही मचाते हैं।
  • ये घटनाएं मुख्य रूप से दक्षिणी, दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में केंद्रित हैं, जहां ग्लेशियरों की सक्रियता अधिक है।
  • वर्ष 2000 के बाद से इन घटनाओं में सांख्यिकीय रूप से एक बड़ा और स्पष्ट बदलाव देखा गया है, जिसकी दर प्रति वर्ष काफी तेज हो गई है।

पृष्ठभूमि और बड़ा परिदृश्य (Background & Context)

नेपाल की लुंबिनी बौद्ध यूनिवर्सिटी, इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंडेन डेवलपमेंट और चीनी एकेडमी ऑफ साइंसेज के 11 शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन को प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अर्थ-साइंस रिव्यूज’ में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2000 से पहले बर्फ के हिमस्खलन की घटनाएं बहुत धीमी गति से बढ़ रही थीं, जो औसतन 0.01 घटनाएं प्रति वर्ष थीं। हालांकि, 2000 के बाद के दौर में यह दर बढ़कर लगभग 0.10 घटनाएं प्रति वर्ष हो गई है। इसका मुख्य कारण वैश्विक तापमान में तेजी से हो रही वृद्धि और इसके परिणामस्वरूप ग्लेशियर वाले ढलानों का अस्थिर होना है। हिमालयी क्षेत्र भौगोलिक रूप से अधिक नम है और यहां गतिशील ग्लेशियर मौजूद हैं, जिससे यहां ऐसी घटनाएं अधिक होती हैं। इसके विपरीत, ठंडे और शुष्क उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों का दायरा सीमित होने के कारण वहां ऐसी घटनाएं कम दर्ज की जाती हैं। जलवायु कारकों के अलावा भूकंप और चट्टानों का खिसकना भी इसके प्रमुख बाहरी ट्रिगर हैं।

प्रभाव और दूरगामी परिणाम (Impact Analysis)

बर्फ के इन हिमस्खलनों का प्रभाव केवल ऊपरी इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने साथ कई अन्य द्वितीयक आपदाओं (Cascading Hazards) को भी जन्म देता है। अध्ययन किए गए 137 मामलों में से लगभग 70 प्रतिशत घटनाएं मलबे के प्रवाह (Debris Flows), ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ (GLOFs) और प्राकृतिक झीलों के निर्माण जैसी गंभीर समस्याओं से जुड़ी थीं। फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली में हुआ विशाल बर्फ-चट्टान हिमस्खलन इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिसके कारण निचले इलाकों में भारी तबाही मची थी और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ था। इसी तरह, अक्टूबर 2023 में सिक्किम में हुई घटना ने भी बुनियादी ढांचे, पुलों और कृषि भूमि को भारी क्षति पहुंचाई थी। इन आपदाओं से न केवल अरबों रुपये की संपत्ति नष्ट हो रही है, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले आम नागरिकों की आजीविका और जीवन पर भी लगातार तलवार लटकी रहती है।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में हिमालयी ग्लेशियरों की अस्थिरता और तेजी से पिघलती बर्फ केवल स्थानीय नहीं, बल्कि संपूर्ण उपमहाद्वीप के लिए एक बड़ी पारिस्थितिक और मानवीय चुनौती बनती जा रही है, जिसके लिए तत्काल एकीकृत निगरानी प्रणालियों की आवश्यकता है।

अंतिम निष्कर्ष (Final Takeaway)

शोधकर्ताओं का यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण और जलवायु संतुलन किस हद तक बिगड़ चुका है। दुर्गम भूभाग, सीमित बुनियादी ढांचे और निगरानी प्रणालियों की कमी के कारण इन खतरों से निपटना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। भविष्य में इस तरह की आपदाओं से होने वाले जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करने के लिए तीन प्रमुख दिशाओं में काम करना होगा। पहला, अंतरिक्ष आधारित, हवाई और जमीनी अवलोकनों को मिलाकर एक एकीकृत निगरानी नेटवर्क तैयार करना। दूसरा, बहु-खतरा जोखिम आकलन रूपरेखा विकसित करना। और तीसरा, क्षेत्रीय स्तर पर अनुकूल और संचालन योग्य प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) को स्थापित करना, जिसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए।

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