टारगेट न्यूज़ ग्राउंड रिपोर्ट: देश भर में जहां विजयादशमी के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के दहन के साथ दशहरा उत्सव का समापन होता है, वहीं देवभूमि हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों में स्थित कुल्लू घाटी से एक बिल्कुल ही अलौकिक और अनूठे पर्व की शुरुआत होती है। दुनिया भर में अपनी विशिष्ट संस्कृति और परंपराओं के लिए विख्यात सात दिवसीय ‘कुल्लू दशहरा’ इस बार भी पारंपरिक हर्षोल्लास और भव्यता के साथ शुरू हो गया है। इस दौरान पूरा ढालपुर मैदान एक भव्य आध्यात्मिक समागम में तब्दील हो गया है, जिसे स्थानीय भाषा और देश-दुनिया में ‘देव महाकुंभ’ के नाम से जाना जाता है। इस ऐतिहासिक और धार्मिक आयोजन को देखने के लिए देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी भारी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु कुल्लू की इस पावन घाटी का रुख कर रहे हैं। इस सात दिवसीय महाकुंभ में भाग लेने के लिए हिमाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों और सुदूर ग्रामीण अंचलों से 300 से अधिक देवी-देवताओं का अदभुत मिलन होता है। भगवान रघुनाथ जी को इस भव्य उत्सव का मुख्य पीठाधीश और presiding deity माना जाता है, जिनकी अगुवाई में सभी धार्मिक अनुष्ठान, भव्य रथ यात्राएं और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की जाती हैं। इसके साथ ही यहां एक विशाल व्यापारिक मेले का भी आयोजन होता है जो पूरे एक महीने तक चलता है और इसमें स्थानीय हस्तशिल्प से लेकर आधुनिक व्यापारिक वस्तुएं आकर्षण का केंद्र बनती हैं। इस भव्य आयोजन का इतिहास सदियों पुराना है और इसकी जड़ें सत्रहवीं शताब्दी के राजा जगत सिंह के शासनकाल से जुड़ी हुई हैं।
ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)
- कुल्लू दशहरा उत्सव की शुरुआत देश भर में विजयादशमी के साथ अन्य जगहों पर उत्सव समाप्त होने पर होती है।
- ढालपुर मैदान में आयोजित इस महाकुंभ में 300 से अधिक देवी-देवता अपने पारंपरिक रथों और पालकियों के साथ पहुंचते हैं।
- इस उत्सव का मुख्य केंद्र भगवान रघुनाथ जी की रथ यात्रा होती है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
- यह ऐतिहासिक मेला सत्रहवीं शताब्दी से राजा जगत सिंह के शासनकाल से लगातार चला आ रहा है।
- न्यायालय के निर्देशों के बाद अब धार्मिक अनुष्ठानों में पशु बलि की प्रथा समाप्त कर दी गई है और इसके स्थान पर प्रतीकात्मक रूप से नारियल व अन्य सामग्रियों का उपयोग किया जाता है।
घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)
कुल्लू दशहरा के इतिहास की शुरुआत 1637 से 1662 के बीच कुल्लू के राजा रहे राजा जगत सिंह के शासनकाल से जुड़ी हुई है। किंवदंतियों के अनुसार, राजा ने एक स्थानीय ब्राह्मण दुर्गादत्त से मोतियों की मांग की थी। ब्राह्मण उस मांग को पूरा करने में असमर्थ रहा और राजा के भय व क्रूरता से बचने के लिए उसने स्वयं को अग्नि के हवाले कर दिया। ब्राह्मण की मृत्यु के कारण उत्पन्न हुए श्राप के परिणामस्वरुप राजा जगत सिंह गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। राजा के आध्यात्मिक गुरु तारानाथ ने उन्हें ऋषि कृष्णदास पथहरी से परामर्श करने की सलाह दी। ऋषि ने राजा को अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से भगवान राम और माता सीता की मूर्तियों को लाने का उपाय बताया। ऐसा माना जाता है कि ये मूर्तियां त्रेता युग की थीं। राजा के एक विश्वासी शिष्य दामोदर दास ने इस कठिन कार्य को अपने हाथ में लिया। दामोदर अयोध्या गए, वहां एक वर्ष तक पुजारियों की सेवा की और अंततः अंगूठे के आकार की उन पवित्र मूर्तियों को लेकर वहां से रवाना हो गए। हरिद्वार में पुजारियों ने उन्हें पकड़ लिया, लेकिन जब वे उन मूर्तियों को उठाने में असफल रहे और दामोदर ने उन्हें आसानी से उठा लिया, तो सभी ने इसे भगवान की इच्छा माना। इसके बाद मूर्तियों को मणिकरण लाया गया जहां वे एक दशक तक रहीं और वहां एक राम मंदिर की स्थापना की गई। किंवदंती के अनुसार, जब राजा जगत सिंह ने भगवान रघुनाथ की मूर्ति के चरणों को धोकर उस जल का आचमन किया, तो वे अपनी असाध्य बीमारी से पूरी तरह चंगे हो गए। अपनी कृतज्ञता और अगाध भक्ति प्रकट करते हुए राजा ने अपना संपूर्ण राज्य भगवान रघुनाथ को समर्पित कर दिया और स्वयं उनके ‘छड़ीबरदार’ यानी मुख्य संरक्षक के रूप में कार्य करने लगे। यह गौरवशाली परंपरा आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही है। वर्ष 1660 में कुल्लू शहर के सुल्तानपुर जिसे रघुनाथपुर भी कहा जाता है, में रघुनाथ मंदिर की स्थापना की गई और मूर्तियों को वहां स्थापित किया गया। राजा ने तब घाटी के सभी देवी-देवताओं को इस उत्सव में भाग लेने और भगवान रघुनाथ को अपना मुख्य देवता स्वीकार करने का आमंत्रण दिया था। तब से लेकर आज तक कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर यह वार्षिक मेला अनवरत रूप से मनाया जा रहा है। समय के साथ इस उत्सव के स्वरूप में कई बदलाव भी आए हैं। वर्ष 2014 में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार्मिक आयोजनों में पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने के बाद, प्राचीन लंका बेकर अनुष्ठान के स्वरूप में ऐतिहासिक बदलाव आया। पहले इस अनुष्ठान के तहत देवी काली को प्रसन्न करने के लिए भैंसे, मेमने, मुर्गे, केकड़े और मछली की बलि दी जाती थी, जो पांच बुराइयों यानी क्रोध, मद, काम, मोह और लोभ के विनाश का प्रतीक थीं। अब पारंपरिक बलि प्रथा के स्थान पर नारियल और अन्य प्रतीकात्मक वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, प्रशासनिक व्यवस्था में भी बदलाव आया है जहां अब जिला प्रशासन व्यापारिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की कमान संभालता है, जबकि राज परिवार की विरासत को मौजूदा छड़ीबरदार आगे बढ़ा रहे हैं।
प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)
कुल्लू दशहरा के सफल आयोजन को लेकर जिला प्रशासन, पुलिस विभाग और स्थानीय आयोजन समितियों ने मिलकर व्यापक तैयारियां की हैं। कानून व्यवस्था बनाए रखने, यातायात नियंत्रण और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए विशेष सुविधाओं के प्रबंध किए गए हैं। स्थानीय लोगों और देवी-देवताओं के कारद्वारों में इस पर्व को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि हमारी कोशिश इस प्राचीन संस्कृति को संरक्षित करते हुए पर्यटकों को बेहतरीन अनुभव प्रदान करने की है।
कुल्लू दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारी उस समृद्ध विरासत का जीवंत प्रमाण है जो सदियों से हमारी आस्था, संस्कृति और भाईचारे को आपस में जोड़े हुए है। आधुनिक समय के साथ भले ही इसके तौर-तरीकों में कुछ बदलाव आए हों, लेकिन हमारी मूल भावना और भगवान रघुनाथ के प्रति अटूट श्रद्धा आज भी उतनी ही पवित्र और अडिग है। – स्थानीय देवता समिति के वरिष्ठ प्रतिनिधि
आगे क्या? (What Lies Ahead)
आने वाले दिनों में कुल्लू दशहरा अपनी भव्यता के अंतिम चरणों की ओर बढ़ेगा जहां लंका दहन और रथ की वापसी जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान संपन्न होंगे। जिला प्रशासन और सांस्कृतिक विभाग का मुख्य उद्देश्य इस प्राचीन त्योहार को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर और अधिक मजबूती से स्थापित करना है ताकि दुनिया भर के लोग हिमाचल की इस अनूठी लोक-संस्कृति से रूबरू हो सकें। आधुनिकता के इस दौर में भी कुल्लू के लोगों ने अपनी प्राचीन परंपराओं और लोक-आस्था की जिस मिसाल को जीवित रखा है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत बनी रहेगी।


















