टारगेट न्यूज़: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने रूपनगर यानी रोपर जिले के सरकारी संरक्षित जंगलों में 1,561 खैर के पेड़ों की अवैध कटाई से जुड़े मामले को आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया है। यह फैसला तब आया जब न्यायाधिकरण ने पंजाब वन विभाग द्वारा इस गंभीर मामले में की गई सुधारात्मक और दंडात्मक कार्रवाइयों का संज्ञान लिया। एनजीटी के चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली प्रिंसिपल बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि रोपर के प्रभागीय वन अधिकारी यानी डीएफओ द्वारा सभी आवश्यक कदम उठा लिए गए हैं, जिसके बाद अब इस मामले में आगे किसी अन्य कार्यवाही की आवश्यकता शेष नहीं है।
मुख्य बिंदु एवं हाइलाइट्स (Key Highlights)
- एनजीटी ने पंजाब के रोपर वन मंडल में 1,561 खैर के पेड़ों की अवैध कटाई से जुड़ी याचिका को किया खारिज।
- वन विभाग ने नियमों का पालन करते हुए प्रत्येक कटे पेड़ के बदले 10 पौधे यानी कुल 15,610 नए पौधे रोपे।
- पौधों के संरक्षण के लिए पांच साल की विशेष मेंटेनेंस योजना लागू, 98 प्रतिशत पौधों के जीवित रहने का दावा।
- अवैध लकड़ी के 793 लट्ठे बरामद, पंजाब और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर पुलिस के साथ मिलकर की गई छापेमारी।
- लापरवाह कर्मचारियों और ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज, विभागीय जांच भी तेजी से जारी।
विस्तृत समाचार एवं पूरा घटनाक्रम (Detailed Report)
यह पूरा कानूनी मामला प्रदीप शर्मा द्वारा दायर की गई एक याचिका के माध्यम से एनजीटी के समक्ष आया था। याचिकाकर्ता ने रूपनगर के फतेहपुर, बगवाली और भंगाला गांवों के संरक्षित वन क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर हरे खैर के पेड़ों की अवैध कटाई और उनकी चोरी पर कड़ी चिंता व्यक्त की थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने वन विभाग से विस्तृत रिपोर्ट तलब की थी। रोपर के डीएफओ द्वारा न्यायाधिकरण को सौंपी गई रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि कुल 1,561 पेड़ों को अवैध रूप से काटा गया था, जिसमें अकेले फतेहपुर जंगल से 772, बगवाली से 743 और भंगाला वन क्षेत्र से 46 पेड़ शामिल थे।
पर्यावरण को पहुंचे इस भारी नुकसान की भरपाई के लिए पंजाब वन विभाग ने त्वरित कदम उठाए। विभाग ने एनजीटी के पिछले निर्देशों का पूरी तरह से पालन करते हुए काटे गए प्रत्येक पेड़ के एवज में 10 पौधे लगाने के नियम के तहत कुल 15,610 नए पौधे रोपे। खास बात यह है कि इन पौधों की लंबी उम्र और सही देखभाल सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक पांच वर्षीय रखरखाव योजना को मंजूरी दी गई है। विभाग द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार, रोपे गए पौधों में से 98 प्रतिशत पौधे पूरी तरह सुरक्षित और जीवित हैं। वन विभाग ने इस पुनर्रोपण अभियान में मुख्य रूप से खैर के साथ-साथ शीशम और मलबेरी, जामुन तथा आम जैसे फलदार पेड़ भी लगाए हैं ताकि स्थानीय वन्यजीवों को भी इसका प्रत्यक्ष लाभ मिल सके।
केवल पौधारोपण तक ही सीमित न रहते हुए, वन विभाग और स्थानीय पुलिस ने संयुक्त रूप से कई स्थानों पर छापेमारी की कार्रवाई की। इस दौरान पंजाब और हिमाचल प्रदेश के विभिन्न ठिकानों से अवैध रूप से काटे गए लकड़ी के कुल 793 लट्ठे बरामद कर उन्हें जब्त कर लिया गया। इस पूरे अवैध कारोबार और प्रशासनिक लापरवाही में संलिप्तता पाए जाने पर इसी वर्ष जनवरी महीने में रोपर के सदर पुलिस स्टेशन में एक प्राथमिकी यानी एफआईआर दर्ज की गई। यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता की धारा 303(2) और भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धाराओं के तहत वन गार्ड नरिंदर सिंह, वनwatcher बहादुर सिंह और ठेकेदार मुकेश सिंह के खिलाफ दर्ज की गई थी। इसके अतिरिक्त, दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच की प्रक्रिया भी जोरों पर है।
एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि वन विभाग ने न केवल बड़े पैमाने पर क्षतिपूर्ति पौधरोपण किया है, बल्कि निगरानी प्रणाली को मजबूत करने के साथ-साथ दोषियों पर कानूनी शिकंजा भी कसा है, जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगेगी।
भविष्य का असर एवं निष्कर्ष (Future Impact & Conclusion)
भविष्य में इस तरह की अवैध गतिविधियों पर पूरी तरह से लगाम लगाने के लिए पंजाब वन विभाग ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। संवेदनशील इलाकों और विशेष रूप से अंतर-राज्यीय मार्गों पर स्थायी चेक पोस्ट स्थापित किए गए हैं और मैदानी गश्त को बहुत ज्यादा तेज कर दिया गया है। एनजीटी ने अपने अंतिम आदेश में यह माना कि विभाग ने पर्यावरण संरक्षण और न्यायहित में सभी अनिवार्य कदम उठा लिए हैं। यह मामला अन्य राज्यों और वन मंडलों के लिए भी एक कड़ा संदेश है कि जंगलों की अवैध कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर अब कड़ी कानूनी और प्रशासनिक नजर रखी जा रही है।


















