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अमेरिकी सेना की इराक से पूरी तरह विदाई: डोनाल्ड ट्रंप ने 12 साल पुराने आईएसआईएस मिशन के अंत को बताया ऐतिहासिक जीत

अमेरिकी सेना की इराक से पूरी तरह विदाई: डोनाल्ड ट्रंप ने 12 साल पुराने आईएसआईएस मिशन के अंत को बताया ऐतिहासिक जीत

टारगेट न्यूज़ ग्राउंड रिपोर्ट: अमेरिकी राजनीति और वैश्विक कूटनीति के पटल पर एक बड़े घटनाक्रम के तहत, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इराक से अमेरिकी सैन्य बलों की पूर्ण और अंतिम वापसी का जोरदार स्वागत किया है। इराक की धरती पर चले लगभग 12 लंबे वर्षों के इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) विरोधी सैन्य अभियान के अंत की घोषणा करते हुए ट्रंप ने इसे अमेरिकी हितों की एक बड़ी विजय और एक अंतहीन ‘दलदल’ (Quagmire) से मुक्ति बताया है। मध्य पूर्व की राजनीति में इस कदम को एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि पिछले एक दशक से अधिक समय से अमेरिकी सैनिक इस क्षेत्र में आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रहे थे। इस संपूर्ण घटनाक्रम ने वैश्विक सुरक्षा विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है, और इसके भू-राजनीतिक परिणामों पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)

  • डोनाल्ड ट्रंप ने इराक से अमेरिकी सेना की वापसी को एक बड़ी सामरिक और राजनीतिक सफलता करार दिया है।
  • यह निर्णय 12 वर्षों तक चले उस व्यापक सैन्य मिशन का समापन है जिसे आईएसआईएस के खात्मे के लिए शुरू किया गया था।
  • अमेरिकी सैन्य नेतृत्व और स्थानीय इराकी प्रशासन के बीच लंबी वार्ताओं के बाद इस रणनीतिक बदलाव को अमली जामा पहनाया गया है।
  • मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य पदचिह्नों में कमी आने से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में एक नया समीकरण उभरने की संभावना है।

घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)

इराक में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का इतिहास बेहद जटिल और संघर्षपूर्ण रहा है। वर्ष 2014 में जब आईएसआईएस ने इराक और सीरिया के विशाल भूभाग पर कब्जा कर लिया था और एक तथाकथित खिलाफत की घोषणा की थी, तब तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपील पर अमेरिका ने इस आतंकवादी संगठन के सफाए के लिए एक बड़ा सैन्य हस्तक्षेप शुरू किया था। शुरुआती दौर में हवाई हमलों और सीमित सलाहकारों की तैनाती से शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे एक व्यापक सैन्य उपस्थिति में बदल गया। हजारों अमेरिकी सैनिकों ने इराकी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षित करने, उन्हें साजो-सामान मुहैया कराने और खुफ़िया जानकारी साझा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

साल दर साल चले इस खूनी संघर्ष में अमेरिका को भारी वित्तीय और मानवीय लागत चुकानी पड़ी। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इराकी सेना के मजबूत होने और आईएसआईएस के प्रादेशिक नियंत्रण के लगभग पूरी तरह खत्म होने के बाद से ही अमेरिकी सेना की भूमिका को कम करने पर विचार किया जा रहा था। हाल ही में कूटनीतिक वार्ताओं का दौर तेज हुआ, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिकी और इराकी सरकारों ने संयुक्त रूप से सैन्य मिशन के चरणबद्ध समापन की रूपरेखा तैयार की। इसी कड़ी में अब अंतिम अमेरिकी सैन्य टुकड़ियों की भी वापसी सुनिश्चित कर दी गई है, जिससे बारह वर्षों के इस लंबे और थका देने वाले अध्याय का औपचारिक रूप से अंत हो गया है।

प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)

इस वापसी की घोषणा के बाद वाशिंगटन से लेकर बगदाद तक तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने आधिकारिक बयानों में इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका को विदेशी युद्धों में अनिश्चितकाल तक फंसे रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने अपने संबोधन में इस मिशन को एक ‘दलदल’ की संज्ञा देते हुए कहा कि अमेरिकी संसाधनों का उपयोग देश के भीतर और अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, इराकी सरकार ने इसे अपनी संप्रभुता की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया है, हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञों का एक वर्ग इस बात को लेकर चिंतित है कि अमेरिकी सुरक्षा छाता हटने के बाद क्षेत्र में आईएसआईएस के स्लीपर सेल दोबारा सिर उठा सकते हैं।

हम इराक में एक ऐसे दलदल में फंसे हुए थे जिसका कोई स्पष्ट अंत नजर नहीं आ रहा था। हमारे सैनिकों ने वहां अद्भुत वीरता का परिचय दिया और अपने मुख्य लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त किया, लेकिन अब समय आ गया है कि हम अपने घर लौटें और अपने देश की प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करें।

आगे क्या? (What Lies Ahead)

इराक से अमेरिकी सेना की इस बहुप्रतीक्षित विदाई के बाद मध्य पूर्व के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या इराकी सुरक्षा बल अपने दम पर आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद के बचे-कुचे खतरों से निपटने में सक्षम साबित होते हैं या नहीं। इसके अलावा, ईरान का इस क्षेत्र में बढ़ता प्रभाव और रूस तथा चीन जैसी अन्य महाशक्तियों की कूटनीतिक चालें भी नए समीकरण तय करेंगी। अमेरिका अब अपनी सैन्य रणनीति को सीधे तौर पर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र और अन्य प्रमुख भू-राजनीतिक चुनौतियों की ओर मोड़ने का प्रयास कर रहा है, जिससे वैश्विक राजनीति की दिशा आने वाले दिनों में तय होगी।

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