Home Chandigarh भगत सिंह की अंतिम इच्छा और ऐतिहासिक फांसी

भगत सिंह की अंतिम इच्छा और ऐतिहासिक फांसी

चंडीगढ़ | राजवीर दीक्षित

(Bhagat Singh’s Final Wish and Historic Execution) भगत सिंह ने अपनी मृत्यु से पहले ब्रिटिश सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण इच्छा व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था कि उन्हें फांसी देने के बजाय गोली मारकर शहीद किया जाए, क्योंकि वे खुद को एक क्रांतिकारी सैनिक और युद्धबंदी मानते थे, न कि कोई अपराधी। उनका मानना था कि उन्हें उसी सम्मान के साथ मृत्यु दी जानी चाहिए, जैसा युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों को मिलता है।

हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने उनकी इस मांग को अस्वीकार कर दिया और फांसी की सजा को ही लागू किया।

भगत सिंह की फांसी का समय भी सामान्य नहीं था। आमतौर पर फांसी सुबह के समय दी जाती थी, लेकिन उन्हें 23 मार्च 1931 की शाम लगभग साढ़े 7 बजे, सूर्यास्त के बाद फांसी दी गई। यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि जनता में बढ़ते आक्रोश और संभावित विरोध से बचा जा सके।

लाहौर जेल में उस समय का दृश्य बेहद भावुक था। जेल के चीफ सुपरिटेंडेंट मेजर पी.डी. चोपड़ा, भगत सिंह और उनके दो साथियों—राजगुरु और सुखदेव—को फांसी के तख्ते की ओर ले जा रहे थे। इस दौरान डिप्टी जेल सुपरिटेंडेंट मुहम्मद अकबर खान भी मौजूद थे, जो इस दृश्य को देखकर अपनी भावनाओं को मुश्किल से नियंत्रित कर पा रहे थे।

सिर्फ 23 वर्ष की आयु में भगत सिंह देश के सबसे लोकप्रिय और प्रेरणादायक क्रांतिकारी बन चुके थे। उन्होंने हंसते-हंसते फांसी को स्वीकार किया और “इंकलाब जिंदाबाद” के नारों के साथ अपने प्राणों का बलिदान दिया।

उनकी शहादत आज भी देशभक्ति, साहस और बलिदान की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है।

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