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पंजाब की नदियों की सुरक्षा के लिए नया कानून बनाने की मांग, मुख्यमंत्री को सौंपा ‘पंजाब रिवर्स अथॉरिटी बिल 2026’ का मसौदा

चंडीगढ़ । राजवीर दीक्षित

(Demand Raised for New Law to Protect Punjab’s Rivers; Draft of the ‘Punjab Rivers Authority Bill 2026’ Submitted to the Chief Minister.)पंजाब के सेवानिवृत्त वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एवं पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव केबीएस सिद्धू तथा पर्यावरण कार्यकर्ता कर्नल (सेवानिवृत्त) जसजीत सिंह गिल ने मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान से राज्य की नदियों के संरक्षण, पुनर्जीवन और प्रभावी प्रबंधन के लिए एक स्वतंत्र वैधानिक प्राधिकरण (स्टैच्यूटरी अथॉरिटी) गठित करने की मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने सतलुज, रावी और ब्यास नदियों के जल पर पंजाब के कानूनी अधिकार को और मजबूत करने की भी वकालत की है।

दोनों ने मुख्यमंत्री को “द सतलुज एंड ईस्टर्न रिवर्स वाटर्स अथॉरिटी ऑफ पंजाब बिल, 2026” का मसौदा और एक विस्तृत नीति-पत्र सौंपा है। इस प्रस्तावित कानून के तहत सतलुज एंड ईस्टर्न रिवर्स वाटर्स अथॉरिटी ऑफ पंजाब नामक एक स्वायत्त वैधानिक संस्था गठित करने का सुझाव दिया गया है, जो सतलुज, ब्यास, रावी, घग्गर और राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य नदियों के समग्र प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालेगी।

प्रस्ताव के अनुसार, इस अथॉरिटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाएगी। इसमें जल विज्ञान, पारिस्थितिकी और जल कानून के विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पर्यावरण कार्यकर्ता, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी तथा प्रधान सचिव स्तर के पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) शामिल होंगे।

नीति-पत्र में कहा गया है कि पंजाब की नदियां गंभीर पर्यावरणीय संकट से गुजर रही हैं। रूपनगर (रोपड़) हेडवर्क्स के नीचे सतलुज में पर्याप्त पर्यावरणीय जल प्रवाह नहीं छोड़ा जा रहा, जिससे जलीय जीवन और प्रदूषण नियंत्रण प्रभावित हो रहा है। दस्तावेज़ में बुद्धा नाला से प्रदूषण, अवैध और अत्यधिक खनन तथा नदी तटों और बाढ़ क्षेत्रों पर अतिक्रमण को भी गंभीर समस्या बताया गया है।

मसौदे में नदियों को वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्ति घोषित करने का प्रस्ताव है, ताकि नागरिकों को स्वच्छ नदी जल, पर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह, बाढ़ से सुरक्षा, नदी तक पहुंच और जल गुणवत्ता संबंधी सार्वजनिक जानकारी का कानूनी अधिकार मिल सके।

बिल का एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि पर्यावरणीय जल प्रवाह को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए और इसे केवल आपातकालीन पेयजल आवश्यकता के बाद ही सीमित किया जा सके। साथ ही नदियों को जीवित रखने के लिए छोड़े गए पानी को सरकारी रिकॉर्ड में “बर्बाद”, “हानि” या “अनुपयोगी जल” नहीं माना जाएगा।

मसौदे में पंजाब के लंबे समय से चले आ रहे नदी जल विवाद पर भी संवैधानिक रणनीति सुझाई गई है। इसमें कहा गया है कि पंजाब पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 की धाराओं 78 से 80 को चुनौती देने के लिए एकतरफा कानून बनाने के बजाय संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख करे।

प्रस्तावित अथॉरिटी को अवैध खनन पर नियंत्रण, बिना उपचारित औद्योगिक अपशिष्ट के नदी में प्रवाह पर रोक, जरूरत पड़ने पर केंद्र से भी कड़े प्रदूषण मानक लागू करने और नियमों का उल्लंघन करने वाले उद्योगों की बिजली या पानी की आपूर्ति रोकने का अधिकार देने की भी सिफारिश की गई है।

वित्तीय स्वतंत्रता के लिए नदी खनन से होने वाली आय का 50 प्रतिशत “पंजाब रिवर्स फंड” में जमा करने, भाखड़ा-ब्यास परियोजनाओं से उत्पादित बिजली पर रिवर मेंटेनेंस सेस तथा बड़े औद्योगिक जल उपभोक्ताओं पर रिवर रिस्टोरेशन सेस लगाने का सुझाव दिया गया है।
इसके अलावा नदी बेसिन प्रबंधन योजना, नदी गलियारों का कानूनी सीमांकन, वेटलैंड्स का पुनर्जीवन, भूजल पुनर्भरण, वार्षिक नदी संतुलन रिपोर्ट, मासिक सार्वजनिक डैशबोर्ड और नदी प्रबंधन से जुड़े बड़े फैसलों से पहले जनसुनवाई जैसे प्रावधान भी प्रस्तावित किए गए हैं।

दोनों विशेषज्ञों ने मुख्यमंत्री से अपील की है कि इस विधेयक को पंजाब विधानसभा में पेश किया जाए, ताकि राज्य की नदियों को प्रदूषण, पर्यावरणीय क्षरण और भविष्य की चुनौतियों से बचाने के लिए एक मजबूत और वित्तीय रूप से सक्षम वैधानिक संस्था बनाई जा सके।

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