Home International नेपाल का नागरिक होने के बावजूद 4 हफ्ते की पैरोल, हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

नेपाल का नागरिक होने के बावजूद 4 हफ्ते की पैरोल, हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

शिमला । राजवीर दीक्षित

(Despite Being a Nepali Citizen, Granted 4-Week Parole: Himachal High Court’s Big Decision)हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने डकैती और हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी को चार सप्ताह की पैरोल देने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर पैरोल से इनकार नहीं किया जा सकता कि कैदी नेपाल का नागरिक है, खासकर तब जब उसके परिवार के सदस्य पिछले 30 से 35 वर्षों से उत्तराखंड के नैनीताल में रह रहे हैं।
जस्टिस राकेश कैन्थला की अदालत में इस मामले की सुनवाई हुई  कैदी ने 23 जून को उसकी पैरोल याचिका खारिज करने वाले आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने 12 अगस्त को सुनवाई के दौरान कहा कि जब कैदी के परिवार के सदस्य लंबे समय से नैनीताल में रह रहे हैं, तो केवल उसकी नेपाली नागरिकता को पैरोल खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

2013 के डकैती-हत्या मामले में उम्रकैद
अदालत के आदेश के मुताबिक, इस व्यक्ति को 30 दिसंबर 2021 को हिमाचल प्रदेश में दर्ज वर्ष 2013 के एक मामले में दोषी ठहराया गया था। मामला हिमाचल प्रदेश के बग्गा पुलिस स्टेशन में दर्ज हुआ था।
कैदी को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-B (आपराधिक साजिश) और धारा 396 (डकैती के दौरान हत्या) के तहत दोषी पाया गया था। दोनों धाराओं में दी गई सजाएं साथ-साथ चलने वाली थीं। आदेश में अपराध की अन्य विस्तृत परिस्थितियों का उल्लेख नहीं किया गया है।

परिवार से मिलने के लिए मांगी थी पैरोल
कैदी ने अपने परिवार से मिलने के लिए पैरोल की मांग की थी। हालांकि, संबंधित अधिकारियों ने उसकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह नेपाल का नागरिक है और पैरोल पर बाहर आने के बाद नेपाल भाग सकता है।
राज्य सरकार की ओर से भी पैरोल का विरोध किया गया। इसमें अपराध की गंभीरता और कैदी के नेपाल भागने की आशंका को आधार बनाया गया।

वहीं, कैदी के वकील ने अदालत को बताया कि उसका परिवार पिछले 30-35 वर्षों से नैनीताल में रह रहा है और वहां उनकी संपत्ति भी है। वकील ने इस संबंध में हाईकोर्ट के पहले के एक फैसले Arjun v State of HP & Others का भी हवाला दिया। राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था पर खतरे का सबूत नहीं
हाईकोर्ट ने Prisoners Rules के Rule 3(2) और Himachal Pradesh Good Conduct Prisoners (Temporary Release) Act, 1968 की Section 6 का उल्लेख किया।
इन प्रावधानों के तहत यदि किसी कैदी की अस्थायी रिहाई से राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा पैदा होने की आशंका हो, तो पैरोल से इनकार किया जा सकता है।

लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट को ऐसा कोई ठोस और विश्वसनीय सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि कैदी की पैरोल पर रिहाई से राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा होगा।
कोर्ट ने अपने पुराने फैसले Arjun v State of HP का हवाला देते हुए कहा कि केवल नेपाली नागरिक होना पैरोल से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं है।

नैनीताल और हिमाचल में परिवार से जुड़े होने की बात भी अहम
अदालत ने कैदी के पारिवारिक संबंधों को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट के सामने यह बात रखी गई कि उसके परिवार के संबंध नैनीताल और हिमाचल प्रदेश दोनों से हैं। उसके माता-पिता का घर और उसके पिता की संपत्ति भी मौजूद है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब कैदी के खिलाफ कोई प्रतिकूल सामग्री सामने नहीं है, तो उसे अनिश्चितकाल तक पैरोल से वंचित रखना पैरोल देने के उद्देश्य को ही विफल कर देगा।

जेल में आचरण भी संतोषजनक पाया गया
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि जेल में कैदी का आचरण संतोषजनक रहा है। उसके खिलाफ ऐसा कोई नया प्रतिकूल रिकॉर्ड सामने नहीं रखा गया, जिसके आधार पर पैरोल को लगातार रोका जा सके।

सुप्रीम कोर्ट के Asfaq v State of Rajasthan फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल का उद्देश्य कैदियों को उनके पारिवारिक और सामाजिक संबंध बनाए रखने का अवसर देना भी है। यह व्यवस्था सुधारात्मक दृष्टिकोण का हिस्सा है।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपराध की गंभीरता अपने आप में पैरोल खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं है। इसके बावजूद सार्वजनिक सुरक्षा और दोबारा अपराध करने का वास्तविक जोखिम पैरोल पर फैसला लेते समय प्रासंगिक हो सकते हैं।

1 लाख रुपये के बॉन्ड पर मिलेगी पैरोल
हाईकोर्ट ने 23 जून 2026 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत कैदी की पैरोल याचिका खारिज की गई थी।
अब उसे चार सप्ताह की पैरोल दी गई है। इसके लिए उसे:
1 लाख रुपये का निजी बॉन्ड भरना होगा।
1-1 लाख रुपये के दो जमानती बॉन्ड देने होंगे।

पैरोल के दौरान अच्छा आचरण बनाए रखना होगा।
चार सप्ताह पूरे होने के बाद उसे जेल में वापस आत्मसमर्पण करना होगा।
उसकी गतिविधियों पर प्रोबेशन अधिकारी नजर रखेगा।
अदालत ने कहा कि राज्य की ओर से ऐसा कोई ठोस और विश्वसनीय आधार रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया है, जिससे यह साबित हो कि कैदी की पैरोल पर अस्थायी रिहाई से कानून की धारा 6 में निर्धारित शर्तों का उल्लंघन होगा।
हालांकि, जेल अधीक्षक को कैदी की रिहाई के समय परिस्थितियों के अनुसार अतिरिक्त उचित शर्तें लगाने का अधिकार दिया गया है।

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