चंडीगढ़। राजवीर दीक्षित
(Employee gets justice after 27 years; promotion granted post-retirement) पंजाब सरकार के एक कर्मचारी को करीब 27 साल बाद सीनियोरिटी और प्रमोशन से जुड़े लाभ मिलने का रास्ता साफ हुआ है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकार को याचिकाकर्ताओं की सीनियोरिटी दोबारा तय करने और प्रमोशन से जुड़े वित्तीय लाभ देने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, इस दौरान सभी याचिकाकर्ता नौकरी से रिटायर हो चुके हैं।
कोर्ट ने सरकार को दो महीने के भीतर आदेशों पर अमल करने को कहा है। साथ ही पेंशन और रिटायरमेंट के दौरान मिलने वाले लाभों का दोबारा हिसाब कर बकाया राशि जारी करने के निर्देश दिए गए हैं।
ज्यादा अंक फिर भी जूनियर कर्मचारियों को मिली प्राथमिकता
मामला वर्ष 1991 में पंजाब स्टेट प्लानिंग बोर्ड में टेक्निकल असिस्टेंट पदों पर भर्ती से जुड़ा है। उस समय विभाग ने 100 प्रतिशत सीधी भर्ती के लिए पदों का विज्ञापन जारी किया था।
इसी दौरान सरकार ने उद्योग विभाग के सरप्लस कर्मचारियों को पहले इन पदों पर समायोजित करने के निर्देश दिए। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि विभागीय स्तर पर हुई गलती के कारण उनके नाम समय पर सरप्लस कर्मचारियों की सूची में नहीं भेजे गए।
बाद में उनके नाम रोजगार कार्यालय के माध्यम से भेजे गए, जबकि उनसे जूनियर कर्मचारियों को पहले ही सरप्लस श्रेणी में समायोजित किया जा चुका था।
मेरिट में आगे रहने के बावजूद नीचे कर दी गई सीनियोरिटी
चयन प्रक्रिया के बाद सामने आया कि याचिकाकर्ताओं ने संबंधित जूनियर कर्मचारियों से अधिक अंक हासिल किए थे। इसके बावजूद 25 नवंबर 1999 को जूनियर कर्मचारियों को रिसर्च ऑफिसर पद पर प्रमोशन दे दिया गया।
इसके बाद 11 अगस्त 2000 को जारी सीनियोरिटी लिस्ट में भी याचिकाकर्ताओं को उन्हीं कर्मचारियों से नीचे रखा गया। सरकार की ओर से दलील दी गई कि सरप्लस कर्मचारियों को पहले समायोजित किया गया था, इसलिए उनकी सीनियोरिटी पहले मानी जाएगी।
2001 में हाईकोर्ट पहुंचे, फैसला आने में लग गए 25 साल
सीनियोरिटी और प्रमोशन के मुद्दे को लेकर नैब सिंह और अन्य कर्मचारियों ने वर्ष 2001 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने 14 सितंबर 2001 को मामले में नोटिस जारी किया।
मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा। इस दौरान याचिकाकर्ताओं को बाद में रिसर्च ऑफिसर के पद पर प्रमोशन तो मिला, लेकिन उन्हें 25 नवंबर 1999 से मिलने वाली सीनियोरिटी और उससे जुड़े वित्तीय लाभ नहीं दिए गए।
रिटायरमेंट के बाद आया फैसला
करीब 25 साल तक चली कानूनी लड़ाई के दौरान सभी याचिकाकर्ता अपनी सेवा पूरी कर सेवानिवृत्त हो गए। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद उन्हें पुरानी सीनियोरिटी, प्रमोशन और उससे जुड़े वित्तीय लाभ मिलने का रास्ता खुल गया है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरप्लस कर्मचारियों को समायोजन में प्राथमिकता दी जा सकती है, लेकिन सिर्फ इस आधार पर उन्हें मेरिट में ऊपर नहीं रखा जा सकता। सरकार को निर्धारित समय में बकाया लाभ की गणना कर भुगतान करना होगा।



















