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बारोग के निर्माण कार्य पर हाईकोर्ट नाराज, प्रशासन की कार्यशैली पर उठे सवाल!

सोलन । राजवीर दीक्षित

बारोग के खीळ जशली कोरों इलाके में कथित तौर पर बेरोकटोक चल रहे निर्माण कार्य और उससे पर्यावरण को पहुंच रहे नुकसान पर हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारियां ठीक से नहीं निभाई गईं। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने नुकसान का नए सिरे से आकलन करने वाली रिपोर्ट मांगी है। चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और जस्टिस जिया लाल भारद्वाज की पीठ ने अधिकारियों को मामले पर दोबारा गंभीरता से विचार करने के निर्देश दिए हैं। 15 सितंबर के आदेश में कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ और जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी भूमिका नहीं निभाई, तो जांच CBI जैसी एजेंसी को सौंपने पर विचार किया जा सकता है। यानी अब इस मामले में प्रशासन की हर कार्रवाई पर कोर्ट की नजर रहेगी।
बारोग इलाके में कथित अनियंत्रित निर्माण और बाहरी बिल्डरों की गतिविधियों को लेकर हाईकोर्ट में दायर PIL पर सुनवाई के दौरान प्रशासनिक रिपोर्ट सवालों के घेरे में आ गई। अदालत ने अधिकारियों द्वारा दाखिल रिपोर्ट को स्वीकार करने के बजाय उसकी गुणवत्ता और निष्पक्षता पर ही सवाल उठा दिए। कोर्ट के अनुसार यह रिपोर्ट अलग-अलग विभागों की मिलीभगत से तैयार किया गया ‘पूरी तरह से लीपा-पोती’ वाला दस्तावेज प्रतीत होती है। ऐसे में अब यह मामला केवल निर्माण गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकारी निगरानी और विभागीय जवाबदेही भी चर्चा के केंद्र में आ गई है।
बारोग में हरियाली कम होती गई और निर्माण बढ़ता गया—लेकिन जिम्मेदारी किसकी? कोर्ट की सुनवाई में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे। कोर्ट ने कहा कि इलाके में हरियाली बनाए रखने में विभाग नाकाम रहा है। साथ ही जल-मार्गों को रोकने और बोरवेल खोदने के मामलों का भी समाधान नहीं किया गया। कोर्ट ने पिछले दस वर्षों में सोलन, नाहन और शिमला के लिए HP Tenancy and Land Reforms Act, 1972 की धारा 118 के तहत दी गई अनुमतियों का भी रिकॉर्ड मांगा।

आदेश पर आदेश… लेकिन कार्रवाई कब?

बारोग में ऊंची इमारतों के निर्माण को लेकर कोर्ट की सख्ती के बीच सरकारी विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल सामने आए हैं।टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के डायरेक्टर को निर्देश दिया गया है कि उन बिल्डर्स की जानकारी कोर्ट के सामने रखी जाए, जिन्हें ऊंची इमारतें बनाने की मंज़ूरी दी गई थी। साथ ही यह भी बताया जाए कि संबंधित मंज़ूरियां किस तारीख को दी गईं।कोर्ट के 11 मई और 10 जुलाई के आदेशों के बावजूद राज्य सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद 25 अगस्त को तीसरे आदेश के बाद ही कारण बताओ नोटिस जारी किए गए।बारोग जैसे संवेदनशील इलाके में निर्माण की निगरानी में कथित लापरवाही ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।

बारोग में आखिर हो क्या रहा है?

एक तरफ बड़े पैमाने पर निर्माण को लेकर कोर्ट सवाल उठा रहा है, तो दूसरी तरफ वन विभाग की रिपोर्ट में 155 पेड़ों की कटाई का जिक्र है।कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि धारा 118 के तहत हिमाचल से बाहर के बिल्डरों को इस इलाके में निर्माण की मंजूरी किस आधार पर और किस उद्देश्य से दी गई?इसके साथ ही एक और बड़ा सवाल सामने आया है—क्या सरकार के पास ऐसा कोई डेटा है, जिससे यह साबित हो सके कि बारोग इतने बड़े निर्माण का दबाव सह सकता है?वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 50,058 वर्गमीटर निजी भूमि से 155 पेड़ काटे गए, जिनकी कटाई मुख्य रूप से SSRN इन्फ्राकॉन LLP, बारोग रिसॉर्ट्स और MMM इन्फ्रा प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ी बताई गई है।

Green Cover कम नहीं हुआ तो फिर इतने पेड़ कैसे कटे? कोर्ट के सवालों से रिपोर्ट पर उठे सवाल!

Google Earth की 2017 से 2026 तक की तस्वीरों में भले ही कुल Green Cover में कोई व्यापक गिरावट नजर नहीं आई, लेकिन कोर्ट के सामने असली सवाल सिर्फ हरियाली का आंकड़ा नहीं, बल्कि पेड़ों की कटाई और उस पर हुई कार्रवाई का था। कोर्ट ने पाया कि निजी जमीन पर पेड़ काटने की अनुमति सीमित है, बावजूद इसके बड़े स्तर पर बिना इजाजत पेड़ काटे जाने के आरोप सामने आए। इसके बाद सबसे बड़ा सवाल कार्रवाई को लेकर खड़ा हुआ। रिपोर्ट में महज एक व्यक्ति के खिलाफ 10,800 रुपये के नुकसान की रिपोर्ट का उल्लेख है। कोर्ट की नाराज़गी इसी बात पर थी कि अगर बड़े पैमाने पर नियमों का उल्लंघन हुआ, तो जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रभावी कदम कहां हैं?

बारोग इलाके में बेनामी लेन-देन को लेकर अदालत ने प्रशासन से जवाब तलब किया है। डिप्टी कमिश्नर को अब कार्रवाई का पूरा ब्यौरा हलफनामे के जरिए अदालत में देना होगा। अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी।

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