टारगेट न्यूज़ ग्राउंड रिपोर्ट: पंजाब के कोटकपूरा में साल 2015 की बेअदबी की घटनाओं और बहबल कलां व कोटकपूरा पुलिस गोलीकांड के पूरे ग्यारह साल बीत जाने के बाद भी न्याय की आस लगाए बैठे विभिन्न सिख संगठनों ने एक बार फिर तीखा विरोध प्रदर्शन किया है। स्थानीय मुख्य चौक पर आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान सिख संगठनों ने वर्तमान आम आदमी पार्टी (आप) सरकार समेत पिछली सरकारों पर भी गंभीर आरोप लगाए और इसे ‘लानत दिवस’ के रूप में मनाया। प्रदर्शन का नेतृत्व दरबार-ए-खासा के प्रमुख और जाने-माने सिख प्रचारक भाई हरजिंदर सिंह माझी ने किया। इस कार्यक्रम में पंजाब विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवा, कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा, कोटकपूरा के कांग्रेस नेता अजयपाल सिंह संधू और कई प्रमुख पंथक संगठनों के प्रतिनिधि भारी संख्या में उपस्थित रहे। इस दौरान प्रशासन और पुलिस बल की मुस्तैदी के बीच पूरा इलाका छावनी में तब्दील नजर आया, जहां पीड़ित परिवारों के दर्द और जनता के आक्रोश की गूंज साफ सुनाई दे रही थी।
ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)
- सिख संगठनों ने 2015 की बेअदबी और गोलीकांड के 11 साल पूरे होने पर कोटकपूरा में ‘लानत दिवस’ मनाया।
- मुख्यमंत्री भगवंत मान को संबोधित 10 पेज का ‘शर्म पत्र’ विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवा को सौंपा गया।
- पत्र में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख का नाम चार्जशीट में शामिल करने में देरी और मामले को दबाने के गंभीर आरोप लगाए गए।
- कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा ने भी सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला।
- विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवा ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि सिख समुदाय की भावनाओं के अनुरूप न्याय सुनिश्चित करने के प्रयास जारी हैं।
घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)
इस विरोध प्रदर्शन की शुरुआत भाई हरजिंदर सिंह माझी द्वारा एक विस्तृत 10-पन्ने के ‘शर्म पत्र’ को सार्वजनिक रूप से पढ़ने के साथ हुई। यह पत्र मुख्यमंत्री भगवंत मान को संबोधित किया गया था, जिस पर माझी और दरबार-ए-खासा के मुख्य प्रवक्ता हरपिंदर सिंह कोटकपूरा के हस्ताक्षर हैं। पत्र की तारीख 14 अक्टूबर 2026 दर्ज है, जो ठीक उसी काले दिन की याद दिलाती है जब 2015 में कोटकपूरा और बहबल कलां में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने गोलियां चलाई थीं। पत्र में आरोप लगाया गया है कि वर्तमान सरकार ने सत्ता में आने से पहले बेअदबी के मुद्दे को भुनाया, लेकिन सत्ता की कुर्सी संभालते ही इस गंभीर मामले को लगभग भुला दिया गया।
इतिहास के पन्नों को पलटते हुए पत्र में जिक्र किया गया कि पिछली सरकार के दौरान इस मामले की जांच करने वाले सेवानिवृत्त आईजी कुंवर विजय प्रताप सिंह को किस तरह राजनीतिक लाभ के लिए एक ‘ब्रांड’ के रूप में इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि बाद में उन्हें विधानसभा के भीतर बार-बार अनुरोध करने के बावजूद इस संवेदनशील मुद्दे पर बोलने की अनुमति नहीं दी गई। न्यायमूर्ति रणजीत सिंह आयोग और आरएस खतत्रा के नेतृत्व वाली एसआईटी की रिपोर्टों का हवाला देते हुए पत्र में दावा किया गया कि जांच के निष्कर्ष सीधे तौर पर डेरा सच्चा सौदा की संलिप्तता की ओर इशारा करते हैं। इसके बावजूद, सरकार पर आरोप लगाया गया कि उसने चार्जशीट में डेरा प्रमुख का नाम जोड़ने के लिए दो साल तक मंजूरी रोके रखी।
गवाह प्रदीप कलेर के बयानों में गुरमीत राम रहीम और हनीप्रीत का नाम आने के बाद भी कोई ठोस कानूनी कार्रवाई न होने पर गहरी नाराजगी जताई गई। पत्र में तर्क दिया गया कि सरकार की यह निष्क्रियता या तो इस बात की ओर इशारा करती है कि उसके बेहद करीबी लोग इस मामले में लिप्त हैं, या फिर उसने आरोपियों के साथ कोई अंदरूनी ‘सौदा’ कर लिया है। इसके अलावा, पंजाब से बाहर मामलों को स्थानांतरित करने की आरोपियों की याचिका पर सरकार के मौन रहने और हर्ष धूरी तथा संदीप बारेता जैसे नामजद आरोपियों के अब तक कानून की पहुंच से बाहर होने पर भी सवाल उठाए गए।
सिख संगठनों द्वारा जारी ‘शर्म पत्र’ में कहा गया, “बेअदबी और गोलीबारी के मामलों में ग्यारह साल बीत जाने के बाद भी न्याय न मिलना इस बात का प्रमाण है कि सत्ता में बैठने वाले लोगों की नीयत साफ नहीं है। न्याय मिलने तक हमारा संघर्ष पूरी ताकत के साथ जारी रहेगा और हम दोषियों को बेनकाब करते रहेंगे।”
प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने केवल आम आदमी पार्टी की सरकार ही नहीं, बल्कि पिछली अकाली-भाजपा और कांग्रेस सरकारों को भी आड़े हाथों लिया। सभी ने एक सुर में कहा कि सभी राजनीतिक दलों ने सिख भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है और केवल राजनीतिक रोटियां सेंकी हैं। कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा ने खुले मंच से सरकार पर झूठ बोलने और जनता से किए गए वादों से मुकरने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि न्याय की मांग करने वाले नागरिकों और पीड़ित परिवारों को केवल झूठे आश्वासन मिले हैं, जबकि जमीनी हकीकत शून्य है।
भारी विरोध और आलोचनाओं के बीच, जब विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवा को ‘शर्म पत्र’ सौंपा गया, तो उन्होंने स्थिति को संभालते हुए कहा कि सरकार इस संवेदनशील मामले पर पूरी गंभीरता से काम कर रही है। संधवा ने स्पष्ट किया कि प्रशासन और शासन स्तर पर ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं जिससे सिख समुदाय की भावनाओं के अनुरूप निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित किया जा सके। हालांकि, वक्ताओं और पीड़ित परिवारों ने इन आश्वासनों को नाकाफी बताते हुए कड़ा विरोध जताया।
बेअदबी के मामलों के अलावा, इस ‘शर्म पत्र’ में पंजाब की कृषि नीति 2023 के क्रियान्वयन में देरी, नदी जल विवादों से जुड़े मुद्दे, साल 2024 का हरियाणा-सीमा किसान आंदोलन, राज्य पर बढ़ता भारी कर्ज, कथित फर्जी मुठभेड़, ड्रग्स का बढ़ता प्रकोप, बिगड़ती कानून व्यवस्था और अपनी सजा पूरी कर चुके सिख कैदियों की रिहाई न होने जैसे ज्वलनशील मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया। पत्र के अंत में कड़े शब्दों में ‘भगवंत मान: शर्म करो’ का नारा बुलंद किया गया।
आगे क्या? (What Lies Ahead)
कोटकपूरा में हुए इस प्रदर्शन और ‘लानत दिवस’ के आयोजन ने एक बार फिर पंजाब की सियासत में भूचाल ला दिया है। आगामी दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर और अधिक तेज होने के आसार हैं। सिख संगठनों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने तय समय सीमा के भीतर बेअदबी और गोलीकांड के असली साजिशकर्ताओं को बेनकाब कर उन्हें सजा नहीं दिलाई, तो इस संघर्ष को पूरे पंजाब में जन आंदोलन का रूप दिया जाएगा। न्याय की यह लड़ाई अब एक बार फिर राज्य के राजनीतिक गलियारों के केंद्र में आ गई है, और आने वाले समय में सरकार पर इस दवाब का असर देखना बेहद दिलचस्प होगा।


















