कांगड़ा।राजवीर दीक्षित
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में अवैज्ञानिक और अनियंत्रित खनन ने पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। पालमपुर, बैजनाथ, जयसिंहपुर और सुलह क्षेत्रों में नदियों-खड्डों से रेत, बजरी और पत्थरों का धड़ल्ले से हो रहा खनन, पहाड़ों की कटाई और जंगलों का विनाश क्षेत्र की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा रहा है।
नदियों के किनारों और जलधाराओं में स्टोन क्रशरों की बढ़ती संख्या तथा भारी मशीनों से हो रही खुदाई ने प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था को प्रभावित किया है। इससे नदी किनारों का कटाव बढ़ रहा है और मिट्टी का क्षरण तेज हो रहा है। न्यूगल, बिनवा, गज, बनेर, आवा, बथू, मोल और भीरल खड्डें खनन की मार झेल रही हैं।
जानकारी के अनुसार, पालमपुर, बैजनाथ और जयसिंहपुर उपमंडलों में खनन और निर्माण गतिविधियों के चलते 7,000 हेक्टेयर से अधिक जमीन प्रभावित हुई है। सबसे ज्यादा चिंता न्यूगल खड्ड को लेकर जताई जा रही है, जो पालमपुर शहर से होकर गुजरती है और कई पेयजल व सिंचाई योजनाओं का प्रमुख जलस्रोत है।
पालमपुर, भवारना और दरोह ब्लॉकों की करीब 30 पंचायतों के 100 गांवों को सिंचाई सुविधा देने वाली किरपाल चंद कुहल भी खतरे की जद में है। वहीं, चरणमाटी और लोअर बैजनाथ कुहलों पर भी खनन का असर पड़ रहा है। ये दोनों कुहल करीब 15 पंचायतों को पानी उपलब्ध करवाती हैं।
खनन और कैचमेंट क्षेत्रों में वनस्पति के नुकसान का असर जलस्रोतों पर भी दिखाई देने लगा है। पिछले गर्मियों में कई खड्डें अप्रैल और मई में ही सूखने की स्थिति में पहुंच गई थीं, जिससे स्थानीय लोगों को सूखे जैसे हालात का सामना करना पड़ा। जिले की ये जलधाराएं करीब 200 पेयजल योजनाओं को पानी उपलब्ध करवाती हैं।
अवैज्ञानिक खनन और वनों की कटाई से पोंग बांध जलाशय में गाद पहुंचने की समस्या भी बढ़ रही है। BBMB अधिकारियों ने कांगड़ा और मंडी जिलों के कैचमेंट क्षेत्रों में हो रही गतिविधियों पर चिंता जताई है। अत्यधिक गाद जमा होने से जलाशय की भंडारण क्षमता और उसकी परिचालन अवधि प्रभावित होने की आशंका है।
रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न सरकारी विभागों की ओर से शिकायतें और अनुरोध किए जाने के बावजूद कई स्थानों पर अवैध खनन जारी है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैज्ञानिक खनन के नियम सख्ती से लागू नहीं किए गए और पहाड़ों की कटाई पर नियंत्रण नहीं हुआ तो क्षेत्र को जल संकट, जैव विविधता के नुकसान, मिट्टी के कटाव और भूस्खलन जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
अब बड़ा सवाल यह है कि कांगड़ा के नदी-नालों और जलस्रोतों को बचाने के लिए प्रशासन कब सख्त कदम उठाएगा?
















