द टारगेट न्यूज़:
पटियाला जिले में आम आदमी पार्टी (AAP) को उस समय बड़ा झटका लगा जब सनौर से विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा और समाना से विधायक चेतन सिंह जौड़ामाजरा ने पार्टी से किनारा कर लिया। इन दोनों विधायकों के इस्तीफे से पटियाला जिले के राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव की संभावना जताई जा रही है, हालांकि आप नेतृत्व का दावा है कि इन राजनीतिक घटनाक्रमों से पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि आम आदमी पार्टी ने पिछले चुनावों के दौरान पटियाला संसदीय क्षेत्र की सभी नौ विधानसभा सीटों पर शानदार जीत हासिल करते हुए क्लीन स्वीप किया था। हरमीत सिंह पठानमाजरा पिछले एक दशक से अधिक समय से राजनीति में सक्रिय हैं और क्षेत्र में उनका अपना मजबूत व्यक्तिगत राजनीतिक आधार व जनसमर्थन है। पिछले साल ही जब पठानमाजरा के पार्टी हाईकमान के खिलाफ बगावत के संकेत मिले थे, तभी से ‘आप’ ने जमीन स्तर पर अपनी तैयारियां शुरू कर दी थीं और रणजोध हद्दाना को निर्वाचन क्षेत्र का प्रभारी नियुक्त कर दिया था। इसके बावजूद पठानमाजरा का पार्टी के भीतर और बाहर एक मजबूत वोट बैंक बना हुआ है। उनके एक करीबी सहयोगी के अनुसार, पठानमाजरा आगामी चुनाव जरूर लड़ेंगे और भाजपा में शामिल होने से उन्हें एक पार्टी का समर्थन भी मिल जाएगा। हालांकि, यदि शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भाजपा के बीच कोई गठबंधन होता है, तो सीट के बंटवारे को लेकर कुछ असमंजस की स्थिति बन सकती है, लेकिन यह तय है कि पठानमाजरा पीछे हटने वाले नहीं हैं। दूसरी ओर, चेतन सिंह जौड़ामाजरा की राजनीतिक स्थिति थोड़ी अलग है। ‘आप’ ने इस साल की शुरुआत में ही उन्हें दरकिनार करना शुरू कर दिया था और पूर्व अकाली-भाजपा कैबिनेट मंत्री एवं दल-बदलू सुरजीत सिंह रखड़ा को समाना निर्वाचन क्षेत्र का प्रभारी नियुक्त कर दिया था। वर्तमान में रखड़ा ही वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठकों से लेकर विकास कार्यों और अनुदानों के वितरण जैसे मामलों में पूरी तरह सक्रिय हैं। एक स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार का मानना है कि जौड़ामाजरा के लिए राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के वास्ते चुनाव लड़ना और जीतना बेहद जरूरी है, क्योंकि 2022 के चुनावों में ‘आप’ को भारी जनसमर्थन की लहर का लाभ मिला था। इन दोनों नेताओं के इस्तीफे के बाद ऐसी चर्चाएं भी तेज हो गई हैं कि आने वाले हफ्तों में कई अन्य समर्थक भी पार्टी छोड़ सकते हैं। पार्टी के भीतर के सूत्रों का कहना है कि शीर्ष पदों पर बैठे इन नेताओं के कुछ मित्रों ने उन्हें मनाने की कोशिश की थी, लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े रहे।


















