Home Delhi SC में बड़ा संदेश: ट्रायल से पहले जेल, सजा नहीं बन सकती!

SC में बड़ा संदेश: ट्रायल से पहले जेल, सजा नहीं बन सकती!

नई दिल्ली। राजवीर दीक्षित

(A major message from the SC: Imprisonment before trial cannot become a form of punishment!) सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के जल जीवन मिशन से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में दो आरोपियों महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को जमानत दे दी है। मामला कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए ₹979.45 करोड़ के ठेके हासिल करने से जुड़ा है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, केवल उनकी गंभीरता के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता और न ही मुकदमे से पहले अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखा जा सकता है।

20 हजार पन्नों का रिकॉर्ड, 124 गवाह

16 अक्तूबर के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक विचाराधीन कैद को मुकदमे के बिना सजा में नहीं बदला जा सकता। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के अधिकार के विपरीत होगा।

पीठ ने मामले की जटिलता पर भी ध्यान दिया। केस में 22 आरोपी, तीन आरोपपत्र, अभियोजन पक्ष के 124 गवाह और 20 हजार से अधिक पन्नों में फैले 192 दस्तावेज शामिल हैं। आरोपियों के खिलाफ आरोप भी अभी तय नहीं हुए थे। ऐसे में मुकदमे की सुनवाई में लंबा समय लगने की आशंका थी।

फर्जी प्रमाणपत्रों से ठेके लेने का आरोप

मामला राजस्थान के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग की ओर से 2021 से 2023 के बीच जारी निविदाओं में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की जांच के अनुसार, श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी और श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी पर IRCON International Limited के नाम से कथित फर्जी कार्य-पूर्णता प्रमाणपत्र और स्वीकृति पत्र इस्तेमाल कर ठेके हासिल करने का आरोप है। दोनों कंपनियों पर सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों के साथ मिलीभगत कर 104 कार्यादेश हासिल करने का भी आरोप है। इस मामले में 30 अक्तूबर 2024 को एफआईआर दर्ज की गई थी।

जमानत के साथ सख्त शर्तें

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों को अपने पासपोर्ट ट्रायल कोर्ट में जमा कराने, अदालत की अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ने, जांच अधिकारी के बुलाने पर पेश होने और जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया है। उन्हें गवाहों को प्रभावित करने, धमकाने या सबूतों से छेड़छाड़ करने से भी रोका गया है। सुनवाई की तारीखों पर नियमित रूप से अदालत में पेश होना अनिवार्य होगा।

पीठ ने स्पष्ट किया कि शर्तों का उल्लंघन करने या बिना पर्याप्त कारण अदालत में पेश न होने पर जमानत रद्द की जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत के आदेश में की गई टिप्पणियों को मामले के गुण-दोष पर राय न माना जाए। आरोपों और साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन ट्रायल कोर्ट करेगा।

सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—आरोप गंभीर होना अलग बात है, लेकिन मुकदमे से पहले लंबी हिरासत को सजा नहीं बनाया जा सकता।

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