टारगेट न्यूज़ ब्यूरो: गुजरात के तटीय इलाकों में एक अद्भुत पर्यावरणीय क्रांति देखने को मिली है, जहां स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी और सरकारी प्रयासों ने बंजर तटों को मैंग्रोव के घने जंगलों में बदल दिया है। साल 1987 में राज्य में मैंग्रोव का दायरा महज 427 वर्ग किलोमीटर तक सीमित था, जो 2026 तक बढ़कर 1,177 वर्ग किलोमीटर से अधिक हो गया है। यह उपलब्धि न केवल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए वरदान साबित हुई है, बल्कि तटीय सुरक्षा के एक नए मॉडल के रूप में भी उभरी है।
समुदाय की भागीदारी और सफलता की कहानी
इस सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारक स्थानीय समुदायों का जुड़ाव रहा है। ग्रामीणों ने न केवल पौधों को रोपने में मदद की, बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए भी कड़े इंतजाम किए। बड़े पैमाने पर चलाए गए वृक्षारोपण अभियानों ने उन क्षेत्रों में भी हरियाली लौटा दी है, जहां कभी समुद्री कटाव का खतरा मंडराता था।
मैंग्रोव केवल पेड़ नहीं हैं, बल्कि ये प्राकृतिक दीवारें हैं जो चक्रवातों और समुद्री तूफानों के दौरान तटीय बस्तियों को सुरक्षा प्रदान करती हैं। यह मॉडल साबित करता है कि प्रकृति के साथ मिलकर काम करना ही स्थायी समाधान है।
पर्यावरण और आजीविका का संगम
मैंग्रोव के विस्तार से न केवल समुद्री जैव विविधता को बढ़ावा मिला है, बल्कि स्थानीय मछुआरों की आजीविका में भी सुधार हुआ है। ये वन समुद्री जीवों के लिए नर्सरी का काम करते हैं, जिससे मछली उत्पादन में वृद्धि हुई है। इसके मुख्य लाभ इस प्रकार हैं:
- समुद्री कटाव में भारी कमी और तटों का स्थिरीकरण।
- चक्रवात और सुनामी जैसी आपदाओं के प्रभाव को कम करना।
- स्थानीय मछुआरों के लिए मछली और केकड़ों के प्रजनन स्थल का विकास।
- कार्बन अवशोषण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई।
राष्ट्रीय स्तर पर ‘MISHTI’ योजना की प्रेरणा
गुजरात की इस सफलता को देखते हुए केंद्र सरकार ने अब इस मॉडल को पूरे देश में लागू करने का निर्णय लिया है। ‘मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटेट्स एंड टेंजिबल इनकम’ (MISHTI) कार्यक्रम के तहत अब अन्य तटीय राज्यों में भी मैंग्रोव के संरक्षण और विस्तार पर जोर दिया जा रहा है। गुजरात का यह ‘ग्रीन कवच’ आज पूरे देश के लिए एक मिसाल बन चुका है, जो यह दिखाता है कि प्राकृतिक बुनियादी ढांचे में निवेश करना भविष्य की सुरक्षा के लिए कितना अनिवार्य है।



















