टारगेट न्यूज़ विशेष कवरेज: सिख पंथ के चौथे गुरु और पवित्र नगरी अमृतसर के संस्थापक श्री गुरु राम दास जी का जन्मोत्सव इस वर्ष एक बार फिर से दो अलग-अलग तिथियों पर मनाया जाएगा। यह स्थिति सिख समुदाय के भीतर नानकशाही कैलेंडर को लेकर लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक और प्रबंधकीय मतभेदों के कारण उत्पन्न हुई है। मूल और संशोधित नानकशाही कैलेंडर के बीच चल रहे इस गतिरोध के परिणामस्वरूप दुनिया भर में सिख श्रद्धालु अपनी-अपनी मान्यताओं और संस्थागत निर्देशों के अनुसार अलग-अलग दिन गुरुपर्व मना रहे हैं, जिससे एक बार फिर से वैश्विक स्तर पर एक एकीकृत कैलेंडर की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है।
प्रमुख आकर्षण और बिंदु (Highlights)
- पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (PSGPC) ने मूल सौर आधारित नानकशाही कैलेंडर के अनुसार 9 अक्टूबर को गुरु राम दास जी का प्रकाश पर्व मनाने की घोषणा की है।
- शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी (DSGMC) ने अकाल तख्त द्वारा अनुमोदित संशोधित कैलेंडर के तहत 27 अक्टूबर को यह पर्व मनाने का निर्णय लिया है।
- लाखों सिखों के बीच कैलेंडर का यह दोहरापन साल 2010 में हुए संशोधनों के बाद से लगातार विवादों के केंद्र में बना हुआ है।
- कनाडा के विद्वान पाल सिंह पुरेवाल द्वारा तैयार मूल नानकशाही कैलेंडर को वर्ष 2003 में सिखों की अलग पहचान स्थापित करने के लिए अपनाया गया था।
- अनेक पंथक संगठनों और वैश्विक सिख संस्थाओं ने पाकिस्तान के गुरुद्वारों के साथ तालमेल बिठाते हुए 9 अक्टूबर को ही मुख्य प्रकाश उत्सव मनाने का समर्थन किया है।
पूरे घटनाक्रम की कहानी (Full Story)
सिख इतिहास और परंपराओं में गुरु राम दास जी का विशेष स्थान है। उनके जन्मोत्सव यानी प्रकाश पर्व की तिथियों को लेकर इस साल जो असमंजस की स्थिति बनी है, वह मूल रूप से नानकशाही कैलेंडर के स्वरूप को लेकर है। पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (PSGPC), जो सौर प्रणाली पर आधारित मूल नानकशाही कैलेंडर का कड़ाई से पालन करती है, इस वर्ष 9 अक्टूबर को लाहौर के चूना मंडी क्षेत्र स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा जनम स्थान गुरु राम दास जी (प्रकाश अस्थान) में यह पावन पर्व मनाएगी। यह स्थान गुरु साहिब का जन्मस्थान है, जहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके विपरीत, भारत में मुख्य प्रबंधकीय निकायों जैसे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी (DSGMC) ने इस पर्व को 27 अक्टूबर को मनाने की घोषणा की है। ये संस्थाएं उस संशोधित कैलेंडर का पालन करती हैं जो चंद्र गणनाओं पर आधारित है और जिसे अकाल तख्त का आधिकारिक समर्थन प्राप्त है।
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कलका ने इस स्थिति पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उनकी संस्था अकाल तख्त द्वारा अनुमोदित कैलेंडर की तिथियों का पूरी तरह से पालन करती है, और इसी कारण गुरु राम दास जी का जन्मोत्सव 27 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। हालांकि, इस दोहरी व्यवस्था को लेकर सिख जगत में तीव्र प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। भारत और विदेशों के कई प्रमुख सिख संगठनों—जिनमें पंथक तालमेल संगठन, अकाल पुरख की फौज और शब्द कीर्तनी जत्था शामिल हैं—ने पाकिस्तान के सिख निकायों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित की है और 9 अक्टूबर को ही गुरुपर्व मनाने का निर्णय लिया है। अकाल पुरख की फौज के प्रमुख जसविंदर सिंह एडवोकेट ने इस भ्रम की स्थिति के लिए सीधे तौर पर एसजीपीसी को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि मूल नानकशाही कैलेंडर में राजनीतिक कारणों से संशोधन किए गए, जिससे इसके मूल स्वरूप और विशिष्टता को नुकसान पहुंचा है।
वर्ष 2010 में जब से इन संशोधनों को लागू किया गया है, तब से सिख धर्म के कई महत्वपूर्ण पर्वों और गुरुपर्वों की तिथियों को लेकर लगातार विवाद सामने आते रहे हैं। आलोचकों और कई पंथक विद्वानों का यह भी मानना है कि संशोधित संस्करण चंद्र गणनाओं को शामिल करने के कारण एक तरह से पुरानी बिक्रमी कैलेंडर प्रणाली की ओर वापसी जैसा है, जबकि इसे नानकशाही नाम से ही चलाया जा रहा है। दूसरी ओर, एसजीपीसी ‘संशोधित कैलेंडर’ शब्द पर आपत्ति जताती है और इसे केवल नानकशाही कैलेंडर के रूप में ही संबोधित करती है। निहंग जत्थेबंदियों, निर्मल संप्रदाय, उदासीन अखाड़ों और दमदमी टकसाल सहित कई प्रभावशाली सिख संस्थाएं इसी कैलेंडर का समर्थन और अनुसरण करती हैं।
मुख्य सवाल और उनके जवाब (Key Questions & Answers)
सवाल 1: गुरु राम दास जी का प्रकाश पर्व इस वर्ष दो अलग-अलग तिथियों (9 अक्टूबर और 27 अक्टूबर) पर क्यों मनाया जा रहा है?
जवाब: यह अंतर मूल नानकशाही कैलेंडर (जो सौर प्रणाली पर आधारित है और पाकिस्तान में मान्य है) और संशोधित नानकशाही कैलेंडर (जो चंद्र गणनाओं पर आधारित है और एसजीपीसी तथा अकाल तख्त द्वारा समर्थित है) के बीच के मतभेदों के कारण है।
सवाल 2: मूल नानकशाही कैलेंडर को सबसे पहले कब और किसने तैयार किया था?
जवाब: कनाडा स्थित सिख विद्वान पाल सिंह पुरेवाल द्वारा तैयार इस कैलेंडर को वर्ष 2003 में एसजीपीसी द्वारा सिखों की एक अलग धार्मिक पहचान को रेखांकित करने के लिए आधिकारिक तौर पर अपनाया गया था।
सवाल 3: इस कैलेंडर विवाद से सिख समुदाय पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
जवाब: तिथियों के बार-बार बदलने और दो अलग-अलग कैलेंडर चलन में होने के कारण वैश्विक सिख समुदाय में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है, जिससे एक एकीकृत धार्मिक कैलेंडर की मांग बार-बार उठ रही है।
हम पूरी तरह से उन तिथियों का पालन करते हैं जो अकाल तख्त द्वारा अनुमोदित कैलेंडर में निर्धारित की गई हैं। तदनुसार ही सभी प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं। – हरमीत सिंह कलका, अध्यक्ष, DSGMC
समापन और निष्कर्ष (Conclusion)
नानकशाही कैलेंडर को लेकर उपजा यह ताजा विवाद एक बार फिर इस बात की ओर इशारा करता है कि सिख पंथ को वैचारिक और प्रबंधकीय स्तर पर एक मंच पर लाने की कितनी गहरी आवश्यकता है। जब तक दुनिया भर के सिख संगठन और धार्मिक संस्थान एक सर्वसम्मत और एकीकृत कैलेंडर प्रणाली पर सहमति नहीं बनाते, तब तक गुरुपर्व जैसी पवित्र तिथियों पर इस प्रकार का असमंजस बना रहेगा। सिख बुद्धिजीवियों और धार्मिक नेतृत्व का यह दायित्व बनता है कि वे आपसी संवाद के जरिए इस गंभीर मुद्दे का एक स्थायी समाधान निकालें ताकि वैश्विक स्तर पर सिख समुदाय की एकता और उसकी विशिष्ट पहचान अक्षुण्ण बनी रहे।


















