राजवीर दीक्षित | नई दिल्ली
(Impact of the West Asia War: Growing Crisis for Farmers) पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारतीय कृषि क्षेत्र पर साफ दिखाई देने लगा है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेजी ने खेती की लागत बढ़ने का खतरा पैदा कर दिया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर काफी निर्भर है, ऐसे में यह संकट किसानों की जेब पर सीधा असर डाल सकता है।
डीजल के दाम बढ़ने से ट्रैक्टर चलाना, सिंचाई करना और फसलों की ढुलाई महंगी हो जाती है। इसके साथ ही गैस की कीमतों में वृद्धि से खाद उत्पादन भी महंगा हो रहा है। इसका मतलब है कि किसानों को अब खेती के लिए पहले से ज्यादा खर्च करना पड़ेगा, जबकि उनकी आमदनी उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही।
खाद की उपलब्धता को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। भारत यूरिया और अन्य उर्वरकों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर करता है। पश्चिम एशिया से सप्लाई प्रभावित होने की आशंका है, जिससे बाजार में खाद की कीमतें और बढ़ सकती हैं। यह स्थिति किसानों के लिए दोहरी मार साबित हो सकती है।
इसके अलावा, बासमती चावल और मसालों जैसे कृषि उत्पादों के निर्यात पर भी असर पड़ सकता है। पश्चिम एशिया भारत का बड़ा बाजार है, और वहां अस्थिरता के कारण मांग घट सकती है। इससे किसानों की कमाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
खाने के तेल और दालों के आयात में महंगाई बढ़ने से आम जनता पर बोझ बढ़ेगा, जिसका अप्रत्यक्ष असर किसानों पर भी पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को तुरंत कदम उठाने की जरूरत है—खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करना, कीमतों को नियंत्रित करना और किसानों को राहत देना जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, यह वैश्विक संकट भारतीय किसानों के लिए नई चुनौतियां लेकर आया है, जिनसे निपटने के लिए मजबूत नीतियों और त्वरित कार्रवाई की जरूरत है।



















