चंडीगढ़। राजवीर दीक्षित
(“Big decision of the Punjab and Haryana High Court regarding pension, read what the full matter is”) पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने दिव्यांग सैनिकों की पेंशन को लेकर बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। Punjab and Haryana High Court ने स्पष्ट कहा है कि यदि कोई सैन्यकर्मी ड्यूटी के दौरान हुई दिव्यांगता के कारण समय से पहले रिटायर किया जाता है, तो उसे दिव्यांगता पेंशन का अधिकार मिलेगा, भले ही उसने 15 साल की न्यूनतम सेवा पूरी न की हो। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर दिया।
यह फैसला जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मंचंदा की खंडपीठ ने सुनाया। मामला उस सैनिक से जुड़ा था जिसने करीब 9 साल तक सेना में सेवा दी थी। मेडिकल बोर्ड ने माना था कि उसकी बीमारी सैन्य सेवा के कारण बढ़ी और उसे 30 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता घोषित किया गया। इसके बाद आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) ने केंद्र सरकार को दिव्यांगता पेंशन देने का आदेश दिया था, जिसे केंद्र ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि संबंधित सैनिक ने केवल 9 साल सेवा की है, जबकि पेंशन के लिए 15 साल की सेवा जरूरी होती है। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि यदि सैनिक को सेवा के दौरान हुई दिव्यांगता के कारण रिटायर किया गया है, तो केवल सेवा अवधि के आधार पर उसे पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट निर्णय दे चुका है। अदालत ने “यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वी.आर. नानूकुट्टन नायर” मामले का हवाला देते हुए कहा कि दिव्यांगता पेंशन सैनिकों का अधिकार है। कोर्ट ने केंद्र सरकार पर स्थापित कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी करने की भी टिप्पणी की। इस फैसले को पूर्व सैनिकों और दिव्यांग सैन्यकर्मियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।



















