चंडीगढ़ । राजवीर दीक्षित
न्यायमूर्ति तेजस करिया ने अपने फैसले में कहा कि आईटी एक्ट में “सूचना” (Information) की परिभाषा को जानबूझकर व्यापक रखा गया है और बदलती तकनीक को देखते हुए इसकी व्याख्या भी व्यापक रूप से की जानी चाहिए। अदालत के अनुसार यदि इस शब्द को केवल पोस्ट, संदेश, फोटो, फाइल या व्यक्तिगत अकाउंट तक सीमित कर दिया जाए तो धारा 69A का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध, प्रसारित या संग्रहीत सूचना भी कानून के दायरे में आती है। इसलिए Telegram जैसे एप्लिकेशन, जो कंप्यूटर नेटवर्क और सॉफ्टवेयर आधारित संरचना पर कार्य करते हैं, धारा 69A के तहत कार्रवाई के पात्र हो सकते हैं।
अदालत ने यह भी माना कि केंद्र सरकार को Telegram पर सार्वजनिक पहुंच सीमित करने का अधिकार था। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि Telegram की ओर से दलील दी गई थी कि सरकार केवल विशेष कंटेंट को ब्लॉक कर सकती है, पूरे प्लेटफॉर्म को नहीं।
विस्तृत आदेश में हाईकोर्ट ने Telegram की सेवाओं को 22 जून तक अस्थायी रूप से निलंबित रखने और इसके संदेश संपादन (Message Editing) फीचर को 30 जून तक बंद रखने के फैसले को भी उचित ठहराया। अदालत ने कहा कि यह कदम NEET-UG 2026 परीक्षा से जुड़ी भ्रामक सूचनाओं और संभावित आपराधिक गतिविधियों को रोकने के उद्देश्य से उठाए गए थे।
कोर्ट ने Telegram की संरचना पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इसके चैनल, ग्रुप, बॉट, क्लाउड स्टोरेज और यूजरनेम आधारित गुमनामी की सुविधा सूचनाओं को बहुत तेजी से फैलाने में सक्षम बनाती है। ऐसे में केवल कुछ चैनलों या बॉट्स को हटाने से समस्या का समाधान नहीं होता, क्योंकि संचालक कुछ ही मिनटों में नए चैनल बनाकर गतिविधियां फिर शुरू कर सकते हैं।
संदेश संपादन सुविधा को लेकर अदालत ने कहा कि इसका दुरुपयोग कर पुराने संदेशों में बदलाव करके यह झूठा प्रभाव पैदा किया जा सकता है कि परीक्षा का प्रश्नपत्र पहले ही लीक हो गया था। इसलिए इस फीचर को अस्थायी रूप से बंद करना भी उचित और संतुलित कदम था।
हालांकि Telegram ने अदालत में यह तर्क दिया कि उसके साथ भेदभाव किया गया है, जबकि अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बिना किसी समान प्रतिबंध के काम कर रहे हैं। कंपनी ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया, लेकिन अदालत ने सरकार की कार्रवाई को कानूनी और परिस्थितियों के अनुरूप माना।
इस फैसले के साथ दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और गलत सूचनाओं को रोकने के लिए सरकार को आवश्यक परिस्थितियों में किसी पूरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी प्रतिबंध लगाने का अधिकार प्राप्त है।



















