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BBMB बकाया भुगतान पर पंजाब मानने के करीब, हिमाचल को 4,200 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद

चंडीगढ़/शिमला । राजवीर दीक्षित

केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) की परियोजनाओं से जुड़े वर्ष 1966 से लंबित बकाये के भुगतान के मुद्दे पर पंजाब सरकार केंद्र के प्रस्ताव को स्वीकार करने के बेहद करीब है। केंद्र ने कहा कि पंजाब, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के बीच इस विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान जल्द निकाला जा सकता है।

30 जुलाई को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि साझेदार राज्यों के बीच बकाये के भुगतान के लिए नए कैशलेस फॉर्मूले के आधार पर आपसी सहमति बनाई जा सकती है। उस समय अदालत ने दर्ज किया था कि हिमाचल प्रदेश और हरियाणा केंद्र के प्रस्ताव पर सैद्धांतिक रूप से सहमत हैं, जबकि पंजाब ने आपत्ति जताई थी।
बुधवार को हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ को बताया कि मामले को इस बात की जानकारी लेने के लिए सूचीबद्ध किया गया है कि पंजाब केंद्र के प्रस्ताव पर सहमत है या नहीं।
केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा, “आज हम संयुक्त रूप से बात कर रहे हैं। पंजाब सहमति के बेहद करीब आ रहा है।” उन्होंने कहा कि प्रस्ताव से जुड़े मतभेदों को दूर किया जा रहा है और मामले की अगली सुनवाई के लिए अगले सप्ताह तारीख देने का अनुरोध किया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई 20 अगस्त को तय की है।

जानकारी के अनुसार, 1 नवंबर 2011 के बाद BBMB भाखड़ा-ब्यास परियोजनाओं से हिमाचल प्रदेश को उसकी 7.19 प्रतिशत बिजली हिस्सेदारी दे रहा है। वहीं, पंजाब और हरियाणा पर इससे पहले की अवधि के करीब 13,066 मिलियन यूनिट बिजली से संबंधित बकाया है।

बकाया भुगतान की दर को लेकर राज्यों के बीच सहमति नहीं बन पाने के बाद केंद्र ने हिमाचल को नकद भुगतान करने के बजाय ऊर्जा के रूप में भुगतान करने का सुझाव दिया है। प्रस्ताव के अनुसार पंजाब और हरियाणा 13,066 मिलियन यूनिट में से 12,000 मिलियन यूनिट से अधिक की बिजली के बराबर हिमाचल का हिस्सा पूरा करेंगे।

इस व्यवस्था के तहत हिमाचल प्रदेश को पंजाब और हरियाणा को करीब 420 करोड़ रुपये का बकाया भुगतान नहीं करना होगा। इस राशि को 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के बकाये में समायोजित किया जाएगा। इसके अलावा, हिमाचल को पंजाब और हरियाणा की ओर पूंजीगत लागत के रूप में 400 करोड़ रुपये से अधिक की राशि भी नहीं देनी होगी।

पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निदेश गुप्ता ने पहले अदालत को बताया था कि मुख्य आपत्ति बिजली की उस दर को लेकर है, जिस पर बकाया तय किया जाना है। उन्होंने कहा था कि 2.50 रुपये प्रति यूनिट की दर बहुत अधिक है और उचित दर तय होनी चाहिए। पंजाब का तर्क था कि मौजूदा दर पर राज्य को करीब 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब से कहा था कि यदि वह आपसी सहमति से समाधान पर सहमत नहीं होता, तो अदालत मामले के गुण-दोष के आधार पर सुनवाई कर फैसला देगी।

यह विवाद पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के बाद से चला आ रहा है। हिमाचल प्रदेश ने अपने अधिकारों को लेकर 1996 में सुप्रीम कोर्ट में मूल वाद दायर किया था। हिमाचल का दावा था कि उत्तराधिकारी राज्य होने के नाते उसे BBMB परियोजनाओं में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
केंद्र के स्तर पर राज्यों के बीच विवाद का समाधान नहीं होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर 2011 को फैसला सुनाया था। इसके तहत BBMB परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी 7.19 प्रतिशत, पंजाब की 51.80 प्रतिशत और हरियाणा की 37.51 प्रतिशत तय की गई थी। चंडीगढ़ की हिस्सेदारी 3.50 प्रतिशत निर्धारित की गई थी।

2011 के फैसले के अनुसार हिमाचल को भाखड़ा परियोजना में 1 नवंबर 1966 से, देहर परियोजना में नवंबर 1977 से और पोंग बांध परियोजना में जनवरी 1978 से हिस्सा मिलना था।

13 जुलाई को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट करीब 15 वर्ष पहले ही हिमाचल प्रदेश के BBMB परियोजनाओं में 7.19 प्रतिशत हिस्से के अधिकार को स्पष्ट रूप से मान्यता दे चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बावजूद राज्य को 13,066 मिलियन यूनिट बिजली और उससे जुड़े वित्तीय लाभ से एक दशक से अधिक समय तक वंचित रखा गया।

मुख्यमंत्री के अनुसार, हिमाचल प्रदेश सरकार BBMB से करीब 4,200 करोड़ रुपये के लंबित बकाये की वसूली के लिए सभी जरूरी कानूनी और प्रशासनिक कदम उठा रही है।

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