चंडीगढ़ । राजवीर दीक्षित
(Significant observation by the Punjab and Haryana High Court: Clearly distinguish between VRS and resignation; make decisions strictly in accordance with the rules) पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा है कि वह सभी संबंधित विभागों और प्राधिकरणों को उचित निर्देश जारी करने पर विचार करे, ताकि कर्मचारियों के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (Voluntary Retirement) या इस्तीफे के अनुरोध को स्वीकार करने से पहले लागू सेवा और पेंशन नियमों के तहत उनकी पात्रता की सख्ती से जांच की जाए।
न्यायमूर्ति नमित कुमार ने ये टिप्पणियां एक असिस्टेंट टाउन प्लानर की याचिका खारिज करते हुए कीं। याचिकाकर्ता ने सेवा छोड़ने के बाद ग्रेच्युटी और अनुपातिक पेंशन समेत पेंशन संबंधी लाभ दिए जाने की मांग की थी, जिसे स्वीकार नहीं किया गया था।
अदालत ने कहा कि फैसले से अलग होने से पहले वह प्रशासनिक स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण सुझाव देना उचित समझती है। इसके साथ ही कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को आदेश दिया कि फैसले की प्रति पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के मुख्य सचिवों को भेजी जाए, ताकि वे इस मामले पर विचार कर आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई कर सकें।
VRS के नियम पूरे नहीं करता था कर्मचारी
न्यायमूर्ति नमित कुमार ने कहा कि विवाद मुख्य रूप से याचिकाकर्ता के उस अनुरोध को संभालने के तरीके से पैदा हुआ, जिसमें उसने ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ की मांग की थी। याचिकाकर्ता लागू सेवा नियमों के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए निर्धारित वैधानिक शर्तों को पूरा नहीं करता था।
इसके बावजूद उसके अनुरोध को आगे बढ़ाया गया और बाद में एक ऐसे प्रावधान का हवाला देते हुए उसे इस्तीफे के रूप में स्वीकार कर लिया गया, जो उसे ऐसा अधिकार प्रदान नहीं करता था। इसके बाद पेंशन संबंधी लाभों को लेकर विवाद खड़ा हुआ और मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।
VRS और इस्तीफा अलग-अलग कानूनी प्रभाव रखते हैं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौजूदा मामला इस बात को सामने लाता है कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति और इस्तीफे के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना बेहद जरूरी है। दोनों के सेवा और पेंशन नियमों के तहत अलग-अलग कानूनी परिणाम होते हैं।
कोर्ट ने कहा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के अनुरोध को केवल औपचारिकता के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। सबसे पहले यह जांचना जरूरी है कि कर्मचारी लागू नियमों में निर्धारित सभी वैधानिक शर्तों को पूरा करता है या नहीं।
बेंच ने कहा कि कर्मचारी द्वारा आवेदन में इस्तेमाल किए गए शब्दों के आधार पर इस्तीफे के आवेदन को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का आवेदन नहीं माना जा सकता।
अधिकारी को पात्रता की जांच करना जरूरी
कोर्ट ने सुझाव दिया कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का अनुरोध स्वीकार करने से पहले सक्षम प्राधिकारी को कर्मचारी की योग्य सेवा अवधि, नोटिस अवधि और लागू नियमों में निर्धारित अन्य सभी शर्तों की विशेष रूप से जांच करनी चाहिए और उसका रिकॉर्ड भी रखना चाहिए।
स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्वीकार करने वाले आदेश में यह भी स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए कि इसे किस वैधानिक प्रावधान के तहत मंजूरी दी जा रही है।
एक ही मामले में VRS और इस्तीफा शब्दों का इस्तेमाल न हो
हाईकोर्ट ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए भी कहा कि एक ही आदेश या मामले की प्रक्रिया के दौरान ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ और ‘इस्तीफा’ शब्दों का एक-दूसरे के स्थान पर या असंगत तरीके से इस्तेमाल न किया जाए।
अदालत ने कहा कि दोनों तरीकों से सेवा समाप्त होने के कानूनी परिणाम काफी अलग होते हैं। इसलिए कर्मचारी की सेवा समाप्ति की प्रकृति को लागू नियमों के अनुसार स्पष्ट रूप से निर्धारित और दर्ज किया जाना चाहिए।
नियम पूरे न होने पर VRS के तौर पर आवेदन स्वीकार न करें
बेंच ने कहा कि अगर कोई कर्मचारी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगता है, लेकिन वह इसके लिए निर्धारित वैधानिक शर्तों को पूरा नहीं करता, तो सक्षम प्राधिकारी केवल आवेदन में इस्तेमाल किए गए शब्दों के आधार पर उसके अनुरोध को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता।
ऐसे मामले में कर्मचारी के अनुरोध पर लागू वैधानिक प्रावधानों के अनुसार ही कार्रवाई की जानी चाहिए और उसके परिणाम के बारे में कर्मचारी को स्पष्ट रूप से जानकारी दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी ये टिप्पणियां प्रशासनिक सुझाव के तौर पर हैं, जिनका उद्देश्य स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति और इस्तीफे से जुड़े मामलों की प्रक्रिया को मजबूत करना और सेवा नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना है।
इस मामले में अधिवक्ता धीरज चावला, मेहक शर्मा, अंकित कुमार और गरिमा नैय्यर ने अदालत की सहायता की, जबकि राज्य की ओर से अधिवक्ता अखिल कामरा पेश हुए।



















