Home Himachal Pradesh नेपाल की बाढ़ के बाद हिमाचल की ग्लेशियल झीलों पर नजर

नेपाल की बाढ़ के बाद हिमाचल की ग्लेशियल झीलों पर नजर

हिमाचल । राजवीर दीक्षित 

(After Nepal floods, Himachal’s glacial lakes under scrutiny)नेपाल में अचानक आई भीषण बाढ़ के बाद हिमाचल प्रदेश की ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिमों पर चर्चा तेज हो गई है। इनमें लाहौल-स्पीति की तेजी से फैल रही गीपांग झील प्रमुख चिंता का विषय बन रही है।
गीपांग झील के बढ़ते दायरे को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। वैज्ञानिक अध्ययनों में सामने आया है कि 1970 के दशक में करीब 27 हेक्टेयर में फैली यह झील 2019 तक बढ़कर लगभग 99 हेक्टेयर हो चुकी थी। नेपाल में अचानक आई बाढ़ से हुई मौतों पर दुख व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि ग्लेशियल झीलों के बनने में खतरा हमेशा बना रहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य के आपदा प्रबंधन अधिकारी झील का अध्ययन कर चुके हैं और उस पर लगातार नजर रखी जा रही है।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने ग्लेशियल झीलों को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि इनके बनने के साथ खतरा हमेशा बना रहता है। वहीं, नेपाल में आई बाढ़ को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि हिमाचल के किसी निवासी के हताहत या प्रभावित होने की अब तक कोई जानकारी सामने नहीं आई है।
हिमाचल में लगातार बढ़ रही प्राकृतिक आपदाओं पर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर पूरे हिमालयी क्षेत्र पर पड़ रहा है। बादल फटने से लेकर ग्लेशियर और दूसरी जलवायु संबंधी घटनाओं के पीछे के कारणों को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च जरूरी है। सुक्खू ने बताया कि उन्होंने अमित शाह से IIT विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों को शामिल कर वैज्ञानिक अध्ययन कराने की मांग की थी, जिसके बाद एक टीम हिमाचल का दौरा भी कर चुकी है।

हिमाचल में ग्लेशियल झीलों से जुड़े संभावित खतरे को लेकर प्रशासन ने निगरानी और तैयारियां तेज कर दी हैं। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निदेशक पुष्पेंद्र राणा के मुताबिक गीपांग समेत संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की सैटेलाइट और रिमोट-सेंसिंग तकनीक से लगातार निगरानी की जा रही है।

गीपांग झील को लेकर डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों का जोखिम मानचित्र तैयार किया जा रहा है। नदी के किनारे 300 मीटर तक के हिस्से को रेड, येलो और ग्रीन जोन में बांटकर यह पता लगाया जा रहा है कि बाढ़ आने की स्थिति में कौन से इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।

प्रशासन अब केवल खतरे की पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैज्ञानिक जोखिम आकलन को आम लोगों के लिए समझने योग्य बनाया जा रहा है। संभावित बाढ़ के जलस्तर और प्रभावित होने वाले क्षेत्रों को चिह्नित कर भविष्य की आपदा से निपटने की तैयारी की जा रही है।

इसके साथ ही सरकार C-DAC के सहयोग से ऐसा अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम मजबूत कर रही है, जिससे खतरे का संकेत मिलने पर निचले इलाकों में रहने वाले लोगों तक समय रहते अलर्ट पहुंचाया जा सके।

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