चंडीगढ़ । राजवीर दीक्षित
पंजाब यूनिवर्सिटी की ओर से बार-बार याद दिलाने और निर्धारित समय-सीमा देने के बावजूद राज्य के 12 गैर-सरकारी संबद्ध कॉलेजों ने अब तक विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार नियमित प्रिंसिपल की नियुक्ति नहीं की है। अब डिप्टी रजिस्ट्रार (कॉलेजेज) ने इन कॉलेजों को 11 सितंबर को एफिलिएशन कमेटी के समक्ष पेश होने के निर्देश दिए हैं। इस संबंध में संबंधित कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी के अध्यक्षों को पत्र भेजे गए हैं।
पिछले वर्ष अक्टूबर में इन कॉलेजों को नियमित प्रिंसिपल नियुक्त करने के लिए रिमाइंडर भेजे गए थे। इसके बाद दिसंबर में उन कॉलेजों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए, जिन्होंने विश्वविद्यालय के निर्देशों के अनुपालन के लिए उचित कदम नहीं उठाए थे।
पिछले साल ऐसे कॉलेजों की संख्या 42 थी, जो अब घटकर 12 रह गई है। हालांकि, इन 12 कॉलेजों ने अभी तक नियमों का पालन नहीं किया है और पंजाब यूनिवर्सिटी कैलेंडर में निर्धारित छह महीने की सीमा से अधिक समय से कार्यवाहक प्रिंसिपलों के जरिए संचालित हो रहे हैं। इनमें से चार कॉलेज लुधियाना के हैं।
विश्वविद्यालय ने उन आधिकारिक पत्राचारों को लेकर भी गंभीर आपत्ति जताई है, जो कॉलेजों द्वारा नियुक्त ऐसे कार्यवाहक प्रिंसिपलों या शिक्षकों के हस्ताक्षर से भेजे जा रहे हैं, जिन्हें विश्वविद्यालय की मंजूरी प्राप्त नहीं है।
नियमित प्रिंसिपल के बिना चल रहे 12 कॉलेजों में होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, चंडीगढ़; एमबीबी जीजीजी गर्ल्स कॉलेज, रत्तेवाल (एसबीएस नगर); डीएवी कॉलेज ऑफ एजुकेशन, अबोहर; बाबा कुंदन सिंह को-एजुकेशन कॉलेज, फिरोजपुर; गुरु नानक कॉलेज, कैंटोनमेंट एरिया, फिरोजपुर; दशमेश गर्ल्स कॉलेज ऑफ एजुकेशन, बादल (मुक्तसर); गुरु नानक कॉलेज, मोगा; आर्य कॉलेज, लुधियाना; गुजरांवाला गुरु नानक खालसा कॉलेज, लुधियाना; गुरु गोबिंद सिंह खालसा कॉलेज फॉर वुमेन, कमालपुरा (लुधियाना); मालवा सेंट्रल कॉलेज ऑफ एजुकेशन फॉर वुमेन, लुधियाना; और गुरु नानक खालसा कॉलेज फॉर वुमेन, होशियारपुर शामिल हैं।
पंजाब यूनिवर्सिटी के डिप्टी रजिस्ट्रार (कॉलेजेज) सुरजीत ठाकुर ने बताया कि एफिलिएशन कमेटी ने गवर्निंग बॉडी के अध्यक्षों को अपने समक्ष पेश होने के लिए बुलाया है, क्योंकि कोई भी प्रिंसिपल छह महीने से अधिक समय तक पद पर नहीं रह सकता।
पंजाब एंड चंडीगढ़ कॉलेज टीचर्स यूनियन (PCCTU) के कार्यकारी सदस्य डॉ. वरुण गोयल ने कहा कि कोई भी प्रिंसिपल छह महीने से अधिक समय तक पद पर नहीं रह सकता। उन्होंने कहा कि ऐसे व्यक्ति शिक्षण कार्य कर सकते हैं, लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं संभाल सकते। उनके अनुसार, नियमित प्रिंसिपल की अनुपस्थिति से शिक्षकों के अधिकार और छात्रों के हित प्रभावित हो रहे हैं।



















