चंडीगढ़। राजवीर दीक्षित
(Major relief from HC for death-row convict; acquitted in murder case) पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बच्चे की हत्या के मामले में मौत की सजा पाए एक आरोपी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अनिश्चित पहचान, inadmissible evidence और जांच में रह गई कमियों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन पक्ष को आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करना होता है।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस हरमीत सिंह देओल की डिवीजन बेंच ने 73 पन्नों के फैसले में ट्रायल कोर्ट की ओर से दी गई IPC की धारा 302 और 201 के तहत दोषसिद्धि और मौत की सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी करते हुए कानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर उसकी तत्काल रिहाई के निर्देश दिए।
शव की पहचान पर ही उठे सवाल
मामले में 16 जून 2018 को बरवाला थाने में FIR दर्ज हुई थी। खेतों में एक बच्चे का सिर कटा शव मिलने के बाद हत्या और सबूत मिटाने का मामला दर्ज किया गया था।
हाईकोर्ट ने सबसे पहले यह सवाल उठाया कि बरामद शव वास्तव में उसी बच्चे का था या नहीं। कोर्ट ने पाया कि बच्चे की मां ने शव की पहचान का दावा किया, लेकिन कपड़ों की पहचान को उचित तरीके से साबित नहीं किया गया।
बच्चे की टी-शर्ट और अंडरवियर बरामद होने के बावजूद सुनवाई के दौरान मां से उन कपड़ों की पहचान नहीं कराई गई। DNA जांच भी पहचान की कमी दूर नहीं कर सकी, क्योंकि हड्डी से पर्याप्त DNA प्रोफाइल नहीं मिल पाया।
पुलिस हिरासत में कपड़ों की पहचान भी नहीं मानी
कोर्ट ने आरोपी द्वारा पुलिस हिरासत में बच्चे के कपड़ों की कथित पहचान को भी कानूनी तौर पर स्वीकार नहीं किया। बेंच ने कहा कि हिरासत के दौरान की गई ऐसी पहचान पर Evidence Act की धारा 26 की रोक लागू होती है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 106 के तहत आरोपी पर यह जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती कि वह बच्चे की मौत की पूरी कहानी समझाए। पहले अभियोजन पक्ष को अपना मामला संदेह से परे साबित करना होगा।
मजिस्ट्रेट के सामने बयान पर भी बड़ा सवाल
मामले में बच्चे की मां का धारा 164 CrPC के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया बयान भी महत्वपूर्ण था। हालांकि, ट्रायल के दौरान उसने आरोपी के खिलाफ पहले दिए गए आरोपों का समर्थन नहीं किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 164 का बयान अपने आप में substantive evidence नहीं है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से गवाही की पुष्टि या विरोधाभास दिखाने के लिए किया जा सकता है। अदालत में दी गई गवाही, जहां आरोपी को जिरह का अधिकार मिला हो, ज्यादा महत्वपूर्ण है।
कथित डिस्क्लोजर स्टेटमेंट पर कोर्ट सख्त
पुलिस के मुताबिक आरोपी ने बहादुरगढ़ में पूछताछ के दौरान कथित तौर पर एक बयान दिया था। कोर्ट ने इस दस्तावेज पर भी गंभीर सवाल उठाए। बेंच ने पाया कि कथित बयान कंप्यूटर से टाइप और प्रिंट किया गया था, जबकि पुलिस के अनुसार बयान रास्ते में दर्ज किया गया था।
कोर्ट ने इस बात का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं पाया कि पुलिस वाहन में कंप्यूटर और प्रिंटर कैसे उपलब्ध थे। अदालत ने इस दस्तावेज को संदिग्ध मानते हुए उस पर भरोसा करने से इनकार कर दिया।
पहले से मिले शव की जगह की ‘बरामदगी’ नहीं मानी
कोर्ट ने कहा कि जिस जगह शव पहले ही मिल चुका था, उसे आरोपी की निशानदेही पर दोबारा दिखाना किसी नए तथ्य की खोज नहीं माना जा सकता। पुलिस और ग्रामीण पहले से उस स्थान के बारे में जानते थे।
बेंच ने कथित डिस्क्लोजर और घटनास्थल के सबूतों में भी अंतर पाया। इसके चलते बरामदगी से जुड़ी अभियोजन की कहानी भी कमजोर पड़ गई।
Childline रिकॉर्ड ने जांच पर खड़े किए सवाल
फैसले में 13 जून 2018 के Childline 1098 रिकॉर्ड को भी अहम माना गया। बच्चे का शव 16 जून को मिला था, लेकिन इससे तीन दिन पहले Childline को एक व्यक्ति ने सूचना दी थी कि महाबीर नाम का व्यक्ति एक महिला और बच्चे को गांव में लाया है और बच्चे के साथ मारपीट कर रहा है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी ने यह पता लगाने की गंभीर कोशिश नहीं की कि महाबीर कौन था और क्या उसका आरोपी से कोई संबंध था। कोर्ट ने इस रिकॉर्ड को आरोपी की पहचान के सवाल से जुड़ा महत्वपूर्ण तथ्य माना।
जांच की कमियों पर कोर्ट ने जताई चिंता
बेंच ने यह भी सवाल उठाया कि बच्चे के शरीर के कई हिस्से गायब कैसे हुए। मेडिकल रिपोर्ट से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि गायब हिस्से जानवरों द्वारा खाए गए थे। कोर्ट के मुताबिक जांच एजेंसी को इस पहलू की भी गंभीरता से पड़ताल करनी चाहिए थी।
हाईकोर्ट ने आरोपी की धारा 313 CrPC के तहत पूछताछ के तरीके पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आरोपी को उसके खिलाफ मौजूद हर महत्वपूर्ण परिस्थिति का स्पष्ट और अलग-अलग जवाब देने का अवसर मिलना चाहिए।
संदेह का लाभ आरोपी को
पूरे मामले में अदालत ने पाया कि अभियोजन की कहानी में पहचान, गवाहों के बयान, कथित बरामदगी, डिस्क्लोजर स्टेटमेंट और जांच से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित रहे।
बेंच ने स्पष्ट किया कि सिर्फ शक या परिस्थितियों के आधार पर मौत की सजा जैसी गंभीर सजा कायम नहीं रखी जा सकती। अभियोजन पक्ष को अपराध संदेह से परे साबित करना होता है। पर्याप्त और विश्वसनीय सबूत नहीं मिलने पर आरोपी को संदेह का लाभ देना ही कानूनी सिद्धांत है।


















