Home Breaking News ऊहल नदी पर प्रदूषण का वार! माइक्रोप्लास्टिक से पर्यावरण को खतरा

ऊहल नदी पर प्रदूषण का वार! माइक्रोप्लास्टिक से पर्यावरण को खतरा

कांगड़ा/मंडी।राजवीर दीक्षित

हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली ऊहल नदी में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी की रिपोर्ट ने कांगड़ा जिले के छोटा भंगाल और मंडी जिले की बरोट घाटी में पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इन क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण प्लास्टिक और पॉलीथिन को खुले में जलाने या नदी में फेंकने की समस्या सामने आ रही है।

Discover Environment जर्नल में प्रकाशित एक शोध अध्ययन में हिमालय के अपेक्षाकृत कम प्रभावित क्षेत्रों में भी माइक्रोप्लास्टिक की बढ़ती मौजूदगी को रेखांकित किया गया है। इससे पर्यटन, प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल और कचरे के अनुचित निपटान के कारण संवेदनशील पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ी है।

छोटा भंगाल की सात पंचायतों और बरोट घाटी में पिछले दशक के दौरान पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी है, लेकिन कचरा निपटान की सुविधाएं उसी अनुपात में विकसित नहीं हो पाई हैं। नतीजतन, प्लास्टिक कचरा जंगलों, खेतों और सड़कों के किनारे बिखरा दिखाई देता है। कई स्थानों पर इसे खुले में जलाया जाता है या जलस्रोतों में फेंक दिया जाता है।

धूप और मौसम के असर से प्लास्टिक छोटे-छोटे कणों में टूट सकता है, जबकि इसे खुले में जलाने से हानिकारक प्रदूषक निकलते हैं। प्लास्टिक के अवशेष मिट्टी और पानी को भी दूषित कर सकते हैं।

बिलिंग के पास स्थित पर्यटन स्थल राजगुंधा में भी समस्या गंभीर बताई जा रही है। बारा पंचायत के प्रधान राजिंदर सिंह के अनुसार, क्षेत्र में रीसाइक्लिंग की सुविधा नहीं है और अधिकतर कचरे को जलाकर या ऊहल नदी में फेंककर निपटाया जा रहा है। पंचायत के पूर्व प्रधान मंगत राम ने भी कहा कि वर्षों से कचरा जलाना ही निपटान का प्रमुख तरीका बना हुआ है।

बैजनाथ ब्लॉक विकास परिषद के अध्यक्ष और धरमन पंचायत के पूर्व प्रधान संजय ठाकुर के मुताबिक, छोटा भंगाल और बरोट घाटी के अन्य हिस्सों में भी ऐसी ही स्थिति है। बहुत कम प्लास्टिक कचरा रीसाइक्लिंग केंद्रों तक पहुंचता है और अलग-अलग प्रकार के कचरे के वैज्ञानिक निपटान की प्रभावी व्यवस्था नहीं है। प्रशासन के समक्ष मुद्दा उठाने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अभी ठोस समाधान नहीं निकला है।

दुर्गम क्षेत्र बारा भंगाल में कचरा एकत्र करने और बाहर ले जाने की सीमित सुविधाओं के कारण लोगों के पास विकल्प कम हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, कुछ घरों में पारंपरिक चूल्हे जलाने के लिए पॉलीथिन का इस्तेमाल भी किया जाता है। इससे निकलने वाला धुआं स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। प्लास्टिक के अवशेष खेतों और जलस्रोतों तक पहुंचकर स्थानीय पर्यावरण तथा खाद्य शृंखला के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।

ऊहल नदी में माइक्रोप्लास्टिक की रिपोर्ट संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन की स्थायी व्यवस्था की जरूरत को उजागर करती है। नियमित कचरा संग्रह, उसे रीसाइक्लिंग केंद्रों तक पहुंचाने, जन-जागरूकता अभियान चलाने और खुले में प्लास्टिक जलाने पर रोक लगाने जैसे कदम जरूरी हैं।

यदि समय रहते प्रभावी व्यवस्था नहीं बनाई गई, तो प्लास्टिक प्रदूषण का असर नदियों, जंगलों, कृषि भूमि और पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र पर और बढ़ सकता है।

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