द टारगेट न्यूज़:
अमृतसर में पिछले 350 वर्षों से भी अधिक समय से दिवाली के पर्व का एक विशेष और ऐतिहासिक महत्व रहा है, जिसे प्रसिद्ध लोकोक्ति ‘दाल रोटी घर की, दिवाली अमृतसर की’ के माध्यम से बयां किया जाता है। आज के समय में स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) में दिवाली का यह पर्व हजारों देसी घी के दीयों, मोमबत्तियों, रंग-बिरंगी रोशनी और आतिशबाजी के साथ भव्य रूप में मनाया जाता है। हालांकि, एक ऐसा दौर भी था जब इस शहर में एक दीया जलाना भी मुगल शासन के दमन के बीच अदम्य साहस का प्रतीक हुआ करता था।सिख समुदाय के लिए यह पर्व बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो 1619 में मुगल कैद से छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब की रिहाई की याद दिलाता है। गुरु साहिब ने ग्वालियर किले से अपने साथ कैद किए गए 52 राजाओं को भी रिहा करवाया था। हालांकि, अमृतसर का दिवाली से जुड़ाव केवल गुरु की वापसी तक सीमित नहीं है। पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला के पंजाब ऐतिहासिक अध्ययन विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ. कुलविंदर सिंह बाजवा के अनुसार, इस त्योहार के महत्व की जड़ें 18वीं शताब्दी के दौरान सिखों पर हुए अत्याचारों और उत्पीड़न में भी गहरी जुड़ी हुई हैं। यदि यह त्योहार केवल गुरु की वापसी से जुड़ा होता, तो यह मात्र एक धार्मिक अवसर तक ही सीमित रहता।मुगल दमन के उस कठिन दौर में, सिख समुदाय के लोग दिवाली और बैसाखी के अवसर पर अमृतसर में इकट्ठा होते थे और सामुदायिक मामलों पर विचार-विमर्श करके सामूहिक निर्णय लेते थे। इन सभाओं को ‘सरबत खालसा’ के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1737 में, मुगल गवर्नर जकारिया खान ने दिवाली पर अमृतसर में सिखों के एकत्र होने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बावजूद सिखों ने इन आदेशों की अवहेलना की और वहां इकट्ठा हुए। इसके परिणामस्वरूप, एक प्रमुख धार्मिक हस्ती भाई मनी सिंह को उस सभा पर लगाए गए कर का भुगतान करने में विफलता के आरोपों के तहत शहीद कर दिया गया था। डॉ. बाजवा का कहना है कि मुगल शासकों के इन कृत्यों का सिख समुदाय पर गहरा प्रभाव पड़ा और लोग अपनी अटूट निष्ठा और समर्पण दिखाने के लिए आज भी दिवाली पर अमृतसर पहुंचते हैं।यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह द्वारा सिख साम्राज्य की स्थापना के बाद ‘सरबत खालसा’ के आयोजन की पुरानी परंपरा समाप्त हो गई, लेकिन अकाल तख्त के जत्थेदार द्वारा इस अवसर पर सिख समुदाय को संबोधित करने की परंपरा आज भी निरंतर चली आ रही है। इस परंपरा के तहत, कार्यवाहक अकाल तख्त जत्थेदार गियानी कुलदीप सिंह गर्गज स्वर्ण मंदिर की दर्शनी ड्योढ़ी से सायं 5 बजे समुदाय के नाम अपना संदेश देंगे।निहंग सिखों ने भी अपनी पारंपरिक उत्सव शैली को सहेज़ कर रखा है। दिवाली के ठीक अगले दिन निहंगों द्वारा घोड़ों की सवारी के साथ एक ‘मोहल्ला’ निकाला जाता है। इसके अलावा, शहर के बाहरी इलाके में एक घोड़ा मेला भी आयोजित किया जाता है, जबकि 11 नवंबर को ‘नेजाबाजी’ प्रतियोगिता निर्धारित की गई है।पर्यावरण प्रदूषण को लेकर हाल के वर्षों में बढ़ती चिंताओं के मद्देनजर, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (SGPC) ने स्वर्ण मंदिर में आतिशबाजी के प्रदर्शन को सीमित कर केवल 10 मिनट का कर दिया है। स्वर्ण मंदिर के प्रबंधक मेजर सिंह के अनुसार, इस आतिशबाजी में तीन टीमें हिस्सा लेती हैं जो परिसर के अलग-अलग कोनों से आतिशबाजी करती हैं। सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली टीमों को क्रमशः 30,000 रुपये और 25,000 रुपये के पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। उनका दावा है कि इलेक्ट्रिक-इग्नाइटर्स से होने वाली यह आतिशबाजी पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण पैदा करती है। इसके साथ ही एसजीपीसी द्वारा पूरे परिसर में दीये प्रज्वलित करने के लिए लगभग 150 किलोग्राम देसी घी का उपयोग किया जाता है, और हजारों श्रद्धालु भी अपने साथ दीये और मोमबत्तियां लाकर इस पावन उत्सव के माहौल को और अधिक दिव्य बनाते हैं।













