चंडीगढ़। राजवीर दीक्षित
(“”No more ‘date after date’!” High Courts will have to deliver judgments within 3 months”) देश की न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों और फैसलों में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और सख्त फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने देश की सभी हाई कोर्टों को निर्देश दिया है कि किसी भी मामले में आदेश सुरक्षित (Reserved) रखने के बाद अधिकतम तीन महीने के भीतर फैसला सुनाना अनिवार्य होगा।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। अदालत ने कहा कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है, खासकर उन मामलों में जो किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े हों।
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिकाओं को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। अदालत के अनुसार, जमानत पर फैसला संभव हो तो उसी दिन सुनाया जाए। यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है तो उसे अगले दिन तक सुनाकर अपलोड करना होगा। इसके साथ ही अदालत ने जेल प्रशासन को भी निर्देश दिए हैं कि जमानत या सजा स्थगन का आदेश जारी होते ही संबंधित अधिकारियों को तुरंत सूचित किया जाए ताकि आरोपी या विचाराधीन कैदी की रिहाई में अनावश्यक देरी न हो।
यह फैसला लाखों लंबित मामलों से जूझ रही भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए एक बड़ा सुधार माना जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी इस फैसले की खूब चर्चा हो रही है और लोग इसे आम नागरिकों के लिए राहत भरा कदम बता रहे हैं। माना जा रहा है कि इससे न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी, मामलों का तेजी से निपटारा होगा और लोगों का न्यायपालिका पर भरोसा और मजबूत होगा।



















