हैप्पी लोहड़ी; जानिए क्यों मनाई जाती है लोहड़ी और क्या है दुल्ला भट्टी तथा सुंदरि–मुंदरी की कहानी

चंडीगढ़। राजवीर दीक्षित
(Lohri: Festival of Harvest, Heritage and Happiness)पंजाब का प्रमुख लोकपर्व लोहड़ी हर वर्ष मकर संक्रांति से एक दिन पहले पूरे उत्साह, उल्लास और परंपरागत रंगों के साथ मनाया जाता है। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सूर्य उपासना, कृषि संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक है। लोहड़ी के साथ सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश की शुरुआत मानी जाती है, जो किसानों के लिए नई उम्मीदों और समृद्धि का संदेश लेकर आती है।

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लोहड़ी का नाम लेते ही दुल्ला भट्टी की वीरता और सुंदरी–मुंदरी की लोककथा स्वतः स्मरण हो जाती है। मुगल काल में गरीबों के रक्षक माने जाने वाले दुल्ला भट्टी ने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और सुंदरी–मुंदरी का सम्मान बचाकर उन्हें नया जीवन दिया। इसी त्याग और साहस की याद में आज भी लोहड़ी की आग के चारों ओर “सुंदर मुंदरिए हो…” जैसे लोकगीत गाए जाते हैं, जो इस पर्व को भावनात्मक गहराई प्रदान करते हैं।

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग से चली आ रही यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा लोहिता नामक राक्षसी के वध के बाद खुशी के रूप में शुरू हुई थी। यही कारण है कि लोहड़ी को असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।

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कृषि प्रधान पंजाब में लोहड़ी का विशेष महत्व है। रबी फसल की बुआई पूरी होने के बाद किसान सूर्य देवता से अच्छी पैदावार की कामना करते हैं। इस दिन अग्नि में गुड़, तिल, मूंगफली, रेवड़ी और गच्चक अर्पित किए जाते हैं। भांगड़ा, गिद्धा और पारंपरिक व्यंजन इस पर्व को और भी जीवंत बना देते हैं। लोहड़ी वास्तव में परंपरा, आस्था और खुशहाली का उत्सव है।

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