82 वर्ष की आयु में निधन के बाद बेटे यशवंत राय ने लिया मां के नेत्रदान का संकल्प, रोटरी आई बैंक होशियारपुर की टीम ने पूरी की प्रक्रिया
ऊना । ममता भनोट
मां भले ही इस दुनिया से विदा हो जाए, लेकिन उसका प्यार, उसके संस्कार और उसकी यादें हमेशा जीवित रहती हैं। कभी-कभी इंसान के जाने के बाद भी उसकी आंखें किसी दूसरे की जिंदगी में ऐसा उजाला भर जाती हैं, जो उसके अस्तित्व को हमेशा के लिए अमर कर देता है। मैहतपुर के वार्ड नंबर दो की निवासी जीतों देवी के नेत्रदान की कहानी भी कुछ ऐसी ही भावुक और प्रेरणादायक है, जहां एक परिवार ने मां को खोने के गहरे दुख के बीच मानवता की ऐसी मिसाल पेश की, जो समाज को सेवा और संवेदना का सच्चा अर्थ समझाती है।
82 वर्ष की आयु में 23 अक्टूबर 2026 को जीतों देवी के निधन के बाद उनके बेटे यशवंत राय ने मां के नेत्रदान का संकल्प लिया। मां से बिछड़ने का दर्द उनके लिए असहनीय था, लेकिन इसी दुख की घड़ी में उन्होंने ऐसा निर्णय लिया, जिससे किसी जरूरतमंद व्यक्ति के जीवन में रोशनी आने की उम्मीद जगी। मां की आंखों के माध्यम से किसी दूसरे व्यक्ति को इस खूबसूरत दुनिया को देखने का अवसर मिल सके, यही इस भावुक पहल के पीछे सबसे बड़ी भावना रही।
मां की विदाई के बीच चुना मानवता का रास्ता
मां का स्थान जीवन में कोई नहीं ले सकता। उनका स्नेह, त्याग और आशीर्वाद हर संतान की सबसे अनमोल पूंजी होते हैं। जीतों देवी के निधन से परिवार में शोक की लहर है, लेकिन उनके नेत्रदान के संकल्प ने इस दुख को मानवता की सेवा से जोड़ दिया है। एक ओर परिवार अपनी प्रिय सदस्य की अंतिम विदाई के गम से गुजर रहा है, तो दूसरी ओर उनकी आंखों के माध्यम से किसी जरूरतमंद को नई उम्मीद मिलने की संभावना इस विदाई को एक विशेष अर्थ दे रही है।
यशवंत राय का यह निर्णय बताता है कि सच्ची श्रद्धांजलि केवल यादों में किसी को जीवित रखने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके संस्कारों को अपने कर्मों में उतारकर भी दी जा सकती है। मां के जाने के बाद उनके नाम से किसी की दुनिया रोशन हो सके, इससे बढ़कर संवेदना और सेवा का संदेश क्या हो सकता है।
समाजसेवा और मानवता को समर्पित है यशवंत राय का जीवन
यशवंत राय उमंग फाउंडेशन, शिमला के महासचिव होने के साथ-साथ नियमित रक्तदाता और समाजसेवी भी हैं। मानवता की सेवा को जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य मानने वाले यशवंत राय ने अपनी मां के नेत्रदान का संकल्प लेकर अपने इन्हीं विचारों को व्यवहार में उतारा है।
उनका मानना है कि मां के संस्कारों को जनसेवा और मानवता के कार्यों के माध्यम से आगे बढ़ाना ही उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है। उन्होंने भावुक संदेश में कहा कि मां भले ही इस दुनिया से विदा हो गई हैं, लेकिन उनकी आंखों के माध्यम से किसी दूसरे व्यक्ति को इस सुंदर संसार को देखने का अवसर मिलना उनके लिए इससे बड़ी श्रद्धांजलि नहीं हो सकती।
उन्होंने लोगों से भी नेत्रदान के प्रति जागरूक होने और इस नेक कार्य के लिए आगे आने की अपील की, ताकि जरूरतमंद लोगों के जीवन में उम्मीद की नई किरण पहुंच सके।
रोटरी आई बैंक होशियारपुर की टीम ने पूरी की नेत्रदान प्रक्रिया
रोटरी आई बैंक होशियारपुर के चेयरमैन जीपी बहल ने बताया कि जीतों देवी के निधन के बाद रोटरी आई बैंक होशियारपुर की चिकित्सकों की टीम ने नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी की। उन्होंने दुख की इस घड़ी में परिवार द्वारा लिए गए निर्णय की सराहना करते हुए कहा कि किसी अपने को खोने के बाद भी दूसरों के जीवन के बारे में सोचना मानवता और संवेदनशीलता का सराहनीय उदाहरण है।
मूल रूप से मैहतपुर के वार्ड नंबर दो की निवासी जीतों देवी, स्वर्गीय संसार चंद की धर्मपत्नी थीं। उनके निधन से परिवार और परिचितों में शोक व्याप्त है। उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार शाम चार बजे किया गया।
एक विदाई, जो किसी की जिंदगी में उजाला बन सकती है
जीतों देवी के नेत्रदान का संकल्प समाज के लिए एक भावुक संदेश है कि मृत्यु जीवन का अंत जरूर है, लेकिन सेवा की भावना को वहीं समाप्त होना जरूरी नहीं। नेत्रदान के माध्यम से जरूरतमंद लोगों को दृष्टि पाने का अवसर मिल सकता है और किसी परिवार में खुशियों की नई शुरुआत हो सकती है।
मां की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती, लेकिन उनकी आंखों से किसी और की दुनिया रोशन होने की संभावना उनके स्नेह और संस्कारों को एक नई पहचान देती है। जीतों देवी अब इस दुनिया में नहीं हैं, मगर उनके नेत्रदान का संकल्प मानवता की उस रोशनी का प्रतीक बन गया है, जो अंधकार के बीच भी उम्मीद जगाती है।
नेत्रदान महादान है—क्योंकि किसी के जाने के बाद भी किसी दूसरे की दुनिया रोशन हो सकती है।


















