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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश: ठेकेदार को 64.58 लाख का भुगतान 3 महीने में करे सरकार

शिमला । राजवीर दीक्षित

(Himachal Pradesh High Court Order: Government to pay ₹64.58 lakh to contractor within 3 months)हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी निर्माण कार्यों के भुगतान में हो रही देरी पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को एनडीएन कंस्ट्रक्शंस की 64,58,414 रुपये की बकाया राशि तीन महीने के भीतर जारी करने का आदेश दिया है।कोर्ट ने साफ किया कि स्वीकृत बिल का भुगतान केवल बजट की कमी का हवाला देकर लंबे समय तक नहीं रोका जा सकता। यदि सरकार निर्धारित समय में भुगतान नहीं करती है, तो बकाया राशि पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।
यह मामला मंडी जिले के सिविल अस्पताल सुंदरनगर में 40 सरकारी क्वार्टरों के निर्माण से जुड़ा है। लोक निर्माण विभाग ने फरवरी 2021 में यह ठेका एनडीएन कंस्ट्रक्शंस को 5.55 करोड़ रुपये से अधिक की लागत पर दिया था।
ठेकेदार की ओर से 11 रनिंग बिल प्रस्तुत किए गए थे। विभाग ने करीब 3.30 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया, लेकिन 11वें बिल की 64.58 लाख रुपये की राशि वर्ष 2024 से अटकी हुई थी।
सुनवाई के दौरान सरकार ने खुद माना कि ठेकेदार का बिल सही और स्वीकृत है। बावजूद इसके बजट उपलब्ध न होने के कारण भुगतान नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने इस देरी पर नाराजगी जताते हुए कहा कि विभाग की ओर से बजट की मांग किए जाने के बावजूद लंबे समय तक भुगतान लंबित रखना उचित नहीं है।

ठेकेदार की परेशानी पर कोर्ट सख्त, सरकार की दलील नहीं मानी
अदालत ने कहा कि सरकार की लापरवाही का सीधा असर ठेकेदार की आर्थिक स्थिति पर पड़ा है। काम पूरा करने के लिए ठेकेदार ने बैंक से कर्ज लिया था, जिस पर लगातार भारी ब्याज बढ़ रहा है। इसके बावजूद भुगतान में देरी से उसकी मुश्किलें बढ़ती चली गईं।

सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि अनुबंध के मुताबिक विवाद का समाधान मध्यस्थता के जरिए होना चाहिए। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एबीएल इंटरनेशनल लिमिटेड बनाम एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब सरकार स्वयं अपनी देनदारी स्वीकार कर रही हो और कोई वास्तविक तथ्यात्मक विवाद मौजूद न हो, तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट सीधे भुगतान का आदेश दे सकता है।

कोर्ट के इस रुख से साफ है कि महज मध्यस्थता की शर्त का हवाला देकर स्वीकार की गई देनदारी के भुगतान को अनिश्चितकाल तक नहीं टाला जा सकता।

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