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पंजाब सीएम के ओएसडी राजबीर घुम्मन ने सीबीआई जांच रद्द कराने के लिए खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा

पंजाब सीएम के ओएसडी राजबीर घुम्मन ने सीबीआई जांच रद्द कराने के लिए खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा

टारगेट न्यूज़: पंजाब के मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष कर्तव्य अधिकारी (ओएसडी) राजबीर सिंह घुम्मन ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा उनके खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर और उसके बाद की गई जांच को रद्द करने की मांग को लेकर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का रुख किया है। यह पूरा मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत 5 अक्टूबर को दर्ज की गई एफआईआर से जुड़ा हुआ है। अपनी याचिका में घुम्मन ने अनुरोध किया है कि जब तक इस अधिनियम के तहत कानूनी रूप से अनिवार्य पूर्व मंजूरी (सैंक्शन) प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक सीबीआई द्वारा की गई सभी कार्रवाई और जांच को अवैध घोषित किया जाए और उसे पूरी तरह से खारिज किया जाए। इस याचिका के दायर होने से राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से सरगर्मी तेज हो गई है और कानूनी एवं प्रशासनिक स्तर पर बहस छिड़ गई है।

मुख्य बिंदु एवं हाइलाइट्स (Key Highlights)

  • पंजाब सीएम के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मन ने हाईकोर्ट में सीबीआई जांच को चुनौती दी है।
  • 5 अक्टूबर को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सीबीआई ने मामला दर्ज किया था।
  • याचिका में आरोप लगाया गया है कि अधिनियम की धारा 17ए के तहत सरकार से कोई पूर्व मंजूरी नहीं ली गई।
  • सीबीआई ने एफआईआर दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर 6 अक्टूबर को संगरूर स्थित उनके आवास पर तलाशी ली थी।
  • याचिकाकर्ता के वकीलों का तर्क है कि छापे की कार्रवाई और पूरी जांच प्रक्रिया पूरी तरह से कानून के खिलाफ है।

विस्तृत समाचार एवं पूरा घटनाक्रम (Detailed Report)

याचिकाकर्ता राजबीर सिंह घुम्मन के अनुसार, सीबीआई ने नियमों को ताक पर रखकर उनके खिलाफ यह कार्रवाई की है। उन्होंने अपनी याचिका में मुख्य रूप से यह तर्क दिया है कि केंद्रीय एजेंसी ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए का खुला उल्लंघन किया है। कानून के मुताबिक, किसी भी लोक सेवक के खिलाफ उसके आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में लिए गए निर्णयों या की गई सिफारिशों से संबंधित मामलों में जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी यानी सरकार से पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य है। घुम्मन के वकीलों ने अदालत को बताया कि सीबीआई ने 5 अक्टूबर की देर रात लगभग 11:50 बजे एफआईआर दर्ज की और बिना किसी कानूनी मंजूरी के अगले ही दिन यानी 6 अक्टूबर को संगरूर में उनके घर पर छापेमारी कर डाली।

याचिका में यह भी विशेष तौर पर उल्लेख किया गया है कि जिस समय उनके आवास की तलाशी ली गई, उस दौरान न तो ओएसडी खुद वहां मौजूद थे और न ही उनका परिवार या कोई अन्य पारिवारिक सदस्य वहां उपस्थित था। ऐसी स्थिति में की गई तलाशी और उसके दौरान की गई जप्ती की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि पंजाब सरकार के पास धारा 17ए के तहत कोई प्रस्ताव नहीं भेजा गया था और न ही सरकार की तरफ से कोई मंजूरी दी गई थी। संसद द्वारा बनाए गए इस कानून का उद्देश्य लोक सेवकों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में अनावश्यक और मनमाने उत्पीड़न से बचाना है, लेकिन इस मामले में उस सुरक्षा कवच को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है।

अदालत में दायर याचिका के माध्यम से यह सुनिश्चित करने की गुहार लगाई गई है कि कानून के दायरे में रहकर ही कोई भी जांच या कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए। याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी है कि सीबीआई अपनी मर्जी से कानून के प्रावधानों को दरकिनार नहीं कर सकती। कानून की धारा 17ए के तहत मिलने वाली सुरक्षात्मक व्यवस्था का पूरी सख्ती के साथ पालन किया जाना चाहिए। यह मामला अभी अदालत में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होना बाकी है। हालांकि, याचिका की एडवांस प्रतियां प्रतिवादी पक्षों को सौंप दी गई हैं, जिसमें केंद्र सरकार और सीबीआई की तरफ से पेश होने वाले अतिरिक्त सॉलिसिटर-जनरल सत्यपाल जैन भी शामिल हैं।

संसद द्वारा अधिनियमित प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई मामला किसी लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में लिए गए निर्णयों या सिफारिशों से संबंधित है, तो सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना कोई भी पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी प्राथमिक जांच या अनुसंधान नहीं कर सकती है। – याचिकाकर्ता के कानूनी सलाहकार

भविष्य का असर एवं निष्कर्ष (Future Impact & Conclusion)

यह कानूनी लड़ाई आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति और नौकरशाही के बीच एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है। यदि उच्च न्यायालय याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाता है और धारा 17ए की अनिवार्यता को सख्ती से लागू करता है, तो यह देश भर की जांच एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि कोई भी केंद्रीय एजेंसी कानूनी प्रक्रियाओं और अनिवार्य सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज करके सीधे तौर पर कार्रवाई नहीं कर सकती है। दूसरी ओर, यदि सीबीआई इस मामले में अपनी कानूनी स्थिति को मजबूती से रखने में सफल होती है, तो यह जांच का दायरा और अधिक व्यापक कर सकता है। फिलहाल, सभी की निगाहें पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की आगामी सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जहां यह तय होगा कि ओएसडी के खिलाफ चल रही जांच कानूनी कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं।

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