Home Dharam सदियों से आस्था, इतिहास और जिज्ञासा का केंद्र है कांगड़ा का ज्वालामुखी...

सदियों से आस्था, इतिहास और जिज्ञासा का केंद्र है कांगड़ा का ज्वालामुखी मंदिर

डॉ. श्रीया कालिया/डॉ. (श्रीमती) मनिंदर कौर

(The Sacred Flame of the Volcano: Empires Vanished, the Flame Kept Burning) धौलाधार की पहाड़ियों की गोद में स्थित ज्वालामुखी मंदिर केवल श्रद्धा का केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास के लंबे सफर का जीवंत साक्षी भी है। यहां चट्टानों की दरारों से निकलती प्राकृतिक अग्नि की पवित्र ज्योति सदियों से निरंतर श्रद्धालुओं को आकर्षित करती रही है। भक्त इसे देवी ज्वालामुखी का स्वरूप मानकर पूजा करते हैं और हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस दिव्य ज्योति के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। इस लौ की विशेषता केवल इसकी धार्मिक महत्ता में नहीं, बल्कि इस तथ्य में भी है कि यह सुल्तानों, मुगल बादशाहों, सिख शासकों और ब्रिटिश अधिकारियों के दौर को अपनी आंखों के सामने बदलते हुए देख चुकी है।

इतिहास की गहराइयों में छिपे संकेत

ज्वालामुखी के इतिहास की संभावनाएं सातवीं शताब्दी तक जाती हैं। इतिहासकार शांति लाल नागर के अध्ययन द टेम्पल्स ऑफ हिमाचल प्रदेश में इस क्षेत्र से गुजरने वाले एक चीनी यात्री के विवरण का उल्लेख मिलता है। यात्री ने चूना-पत्थर की चट्टानों से गर्म और ठंडे पानी के निकलने की असाधारण घटना का वर्णन किया था। उन्नीसवीं शताब्दी में पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस विवरण को ज्वालामुखी क्षेत्र से जोड़ने की संभावना व्यक्त की। हालांकि उन्होंने इसे निश्चित तथ्य नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक संभावना के रूप में प्रस्तुत किया।

तुगलक के दौर में भी दर्ज हुई मौजूदगी

ज्वालामुखी मंदिर का प्रत्यक्ष ऐतिहासिक उल्लेख चौदहवीं शताब्दी में मिलता है। फ़ारसी ग्रंथ तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही, जिसे दरबारी इतिहासकार शम्स-ए-सिराज अफ़ीफ़ ने लिखा, में सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुगलक के कांगड़ा अभियान के दौरान मंदिर आने का उल्लेख है। इस यात्रा को लेकर इतिहास में अलग-अलग विवरण और व्याख्याएं मिलती हैं। कुछ कथाओं में सुल्तान द्वारा मंदिर में देवी के दर्शन किए जाने का उल्लेख है, जबकि कनिंघम ने इसे संभवतः जिज्ञासावश किया गया दौरा माना।

यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि कनिंघम की व्याख्या उनके अपने ऐतिहासिक दृष्टिकोण को दर्शाती है। इसे मंदिर की धार्मिक आस्था या श्रद्धालुओं की मान्यताओं पर किसी निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

मुगल दरबार तक पहुंची ज्वाला की चर्चा

अकबर के शासनकाल में मुगल इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने भी इस स्थल का उल्लेख किया। उन्होंने यहां दिखाई देने वाली पर्वतीय रोशनियों और बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं का वर्णन किया। हालांकि, उन्होंने इन प्राकृतिक ज्वालाओं को धार्मिक चमत्कार के बजाय गंधक की खान के प्राकृतिक प्रभाव से जोड़कर देखा।

यही पहलू ज्वालामुखी के इतिहास को और रोचक बनाता है। एक ही प्राकृतिक घटना को अलग-अलग कालखंडों में आस्था, जिज्ञासा और प्राकृतिक विज्ञान के अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखा गया।

यूरोप तक पहुंची ज्वालामुखी की चर्चा

सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेज यात्री थॉमस कोर्यट ने इस मंदिर को ‘जल्लामाकी’ नाम से दर्ज किया। बाद में फ्रांसीसी यात्री ज्यां द थेवेनो ने भी इस स्थल का उल्लेख किया। उनके विवरण इस बात की ओर संकेत करते हैं कि ज्वालामुखी की जलती हुई ज्योति और इससे जुड़ी मान्यताओं ने यूरोपीय यात्रियों का ध्यान भी आकर्षित किया था।

राजसी संरक्षण से ब्रिटिश अभिलेखों तक

उन्नीसवीं शताब्दी में सिख शासन के दौरान मंदिर को महत्वपूर्ण राजसी संरक्षण प्राप्त हुआ। महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में मंदिर को संरक्षण मिला। उनके पुत्र खड़क सिंह द्वारा मंदिर को अलंकृत चांदी का द्वार भेंट किए जाने का उल्लेख भी मिलता है। बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान ज्वालामुखी मंदिर को गजेटियरों में दर्ज किया गया और धार्मिक महत्व के साथ-साथ इसकी प्राकृतिक एवं भूवैज्ञानिक विशेषताओं का भी उल्लेख हुआ।

साम्राज्य बदले, ज्योति बनी रही

ज्वालामुखी मंदिर की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यही है कि सत्ता के अनेक दौर आए और चले गए, लेकिन मंदिर की पवित्र ज्योति श्रद्धा का केंद्र बनी रही। सुल्तानों से लेकर मुगल बादशाहों तक, सिख शासकों से लेकर ब्रिटिश अधिकारियों तक—अलग-अलग युगों के लोगों ने इस स्थल को अपने-अपने दृष्टिकोण से देखा, समझा और दर्ज किया।

आज जब कोई श्रद्धालु ज्वालामुखी की पवित्र ज्योति के सामने खड़ा होता है, तो वह केवल एक धार्मिक स्थल पर उपस्थित नहीं होता, बल्कि इतिहास की उन अनेक परतों के बीच खड़ा होता है, जिनसे यह मंदिर सदियों से गुजरता आया है।

ज्वालामुखी की यह लौ इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह आस्था और इतिहास के बीच एक जीवंत सेतु बनाती है। इसके आसपास विकसित हुई कथाएं, ऐतिहासिक विवरण और यात्रियों के अभिलेख बताते हैं कि इस स्थल ने समय के साथ धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और प्राकृतिक—हर दृष्टि से लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

 

डॉ. श्रीया कालिया
पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो, मानवशास्त्र विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़

डॉ. (श्रीमती) मनिंदर कौर
एसोसिएट प्रोफेसर, मानवशास्त्र विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़

Translate »
error: Content is protected !!