। राजवीर दीक्षित
(Protests erupt over the Kishau agreement; villagers take to the streets to express their displeasure) उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में प्रस्तावित किशाऊ मल्टीपर्पज़ प्रोजेक्ट को लेकर स्थानीय लोगों की चिंता सामने आई है। क्वानू और आसपास के गांवों के ग्रामीणों ने बुधवार को परियोजना के विरोध में प्रदर्शन किया।
किशाऊ बांध संघर्ष समिति के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन में स्थानीय विधायक प्रीतम सिंह चौहान भी शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र और राज्य सरकार के पुतले फूंके और प्रस्तावित बांध के खिलाफ नारेबाजी की।
यह विरोध ऐसे समय हुआ है, जब एक दिन पहले ही केंद्र सरकार और यमुना बेसिन के छह राज्यों के बीच परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।
स्थानीय लोगों की प्रमुख चिंता पुश्तैनी घरों, जमीन और संभावित विस्थापन को लेकर है। ग्रामीण परियोजना के संभावित प्रभावों को लेकर अपनी आपत्तियां लगातार सामने रख रहे हैं।
किशाऊ प्रोजेक्ट से विकास की उम्मीदें हैं, लेकिन प्रभावित परिवारों के लिए इसके साथ एक बड़ा डर भी जुड़ा है। डर अपनी जमीन खोने का, डर अपने घर से उजड़ने का और डर उस जगह से दूर होने का, जहां उनके परिवारों की कई पीढ़ियां गुजरी हैं।
उनके लिए किशाऊ सिर्फ बांध नहीं, बल्कि अपनी जमीन और पहचान बचाने की लड़ाई का सवाल बन गया है।
विरोध कर रहे लोगों ने यही सवाल उठाया। उनका आरोप है कि पानी और बिजली की बड़ी परियोजनाओं का लाभ निचले इलाकों को मिलता है, जबकि पहाड़ों में रहने वाले लोगों को अपने घर और जमीन से बेदखली का सामना करना पड़ता है।
किशाऊ बांध संघर्ष समिति ने कहा कि परियोजना से प्रभावित क्षेत्र के लोगों का पहाड़ों के साथ गहरा सामाजिक, सांस्कृतिक और पुश्तैनी संबंध है।
समिति के संरक्षक मुन्ना सिंह राणा, अध्यक्ष सूर्य प्रताप सिंह और उपाध्यक्ष नरेंद्र सिंह राणा के अनुसार, आदिवासी समुदाय के परिवार कई पीढ़ियों से यहां रहते आए हैं।
उनका कहना है कि बांध निर्माण के चलते यदि लोगों को विस्थापित किया जाता है तो इसका असर केवल उनकी जमीन पर नहीं, बल्कि उनकी पारंपरिक जीवनशैली और सामाजिक संरचना पर भी पड़ेगा।
समिति ने प्रभावित परिवारों की चिंताओं को गंभीरता से लेने की मांग की है।किशाऊ प्रोजेक्ट को लेकर जमीन बचाने की लड़ाई तेज होती नजर आ रही है। समिति के नेताओं ने कहा कि सरकार की ओर से दिया जाने वाला मुआवज़ा उनकी पुश्तैनी जमीन और घरों से जुड़ी भावनाओं की कीमत तय नहीं कर सकता।
प्रदर्शनकारियों ने कहा, “हम मौत तो मंजूर कर सकते हैं, लेकिन अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे।” उनका कहना है कि विस्थापन से केवल घर और खेत नहीं छूटेंगे, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं और जीवनशैली भी प्रभावित होगी।
नेताओं ने स्पष्ट किया कि समझौते पर हस्ताक्षर होने के बावजूद उनका विरोध खत्म नहीं होगा और वे विस्थापन के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे।टोंस नदी पर बनने वाले प्रस्तावित प्रोजेक्ट ने हिमाचल और उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाकों में चिंता बढ़ा दी है। परियोजना की संभावित जद में हिमाचल के सिरमौर और शिमला जिलों के कुछ हिस्से भी बताए जा रहे हैं। यही वजह है कि दोनों राज्यों की सीमा से जुड़े इलाकों में इस प्रोजेक्ट की हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है।
सरकार इसे बिजली, सिंचाई और पेयजल के लिहाज से अहम परियोजना बता रही है, लेकिन क्वानू के लोगों के लिए सवाल विकास से पहले अपने अस्तित्व का है। ग्रामीण पूछ रहे हैं—जलाशय बना तो उनके घर कहां जाएंगे? खेतों का क्या होगा? और पीढ़ियों से बसे पुश्तैनी गांवों का भविष्य क्या होगा?
दशकों से अटके इस प्रोजेक्ट के आगे बढ़ने के साथ ही अब एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है। बुधवार को हुए विरोध-प्रदर्शन ने परियोजना के मानवीय पहलू को उजागर कर दिया। जलमग्न क्षेत्र में आने वाले गांवों के लोगों को डर है कि विकास की इस परियोजना के चलते उन्हें अपने पुश्तैनी घरों और जमीनों से हाथ धोना पड़ सकता है।



















