शिमला। राजवीर दीक्षित
(Crisis over salaries of deputation staff; High Court order sparks a stir in the Education Department) हिमाचल प्रदेश में शिक्षा विभाग की डेपुटेशन व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद करीब 500 शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारियों के वेतन पर संकट मंडराने लगा है।
इनमें सबसे बड़ा हिस्सा शिक्षकों का है। ये शिक्षक स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के बजाय शिक्षा निदेशालय, उपनिदेशालय और अन्य कार्यालयों में डेपुटेशन पर तैनात हैं और वहां विभागीय कामकाज संभाल रहे हैं।
एक तरफ स्कूलों में शिक्षकों की जरूरत, दूसरी तरफ दफ्तरों में शिक्षकों की तैनाती—अब इस अंतर पर कानूनी आदेश का असर दिखाई देने लगा है।
गैर-शिक्षक कर्मचारियों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद शिक्षा विभाग में इस पूरी व्यवस्था को लेकर हलचल बढ़ गई है और प्रभावित कर्मचारियों की नजर अब विभागीय कार्रवाई पर टिकी है।
दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षक भेजे जाते हैं, लेकिन क्या सभी शिक्षक वहां पहुंचकर अपनी ड्यूटी संभालते हैं? कई मामलों में ऐसा नहीं होता। तबादले के बाद शिक्षक शहर के आसपास के स्कूलों या शिक्षा विभाग के विभिन्न कार्यालयों में डेपुटेशन हासिल कर लेते हैं।
सवाल यह है कि अगर डेपुटेशन अस्थायी व्यवस्था है, तो यह लंबे समय तक कैसे जारी रहती है?इस पूरी व्यवस्था का असर उन स्कूलों पर पड़ता है, जहां पहले से ही शिक्षकों की कमी है।
कागजों में तैनाती नहीं चलेगी! हाई कोर्ट ने DDO को बनाया जिम्मेदार
डेपुटेशन व्यवस्था पर हाई कोर्ट के सख्त आदेश के बाद अब कर्मचारियों की वास्तविक तैनाती पर नजर रखी जाएगी। सभी डीडीओ को निर्देश दिया गया है कि वे कर्मचारी के सैलरी बिल को प्रमाणित करने से पहले यह पुष्टि करें कि उसने संबंधित महीने में उसी स्टेशन पर काम किया है।
इससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश होगी कि जिस जगह की तैनाती दिखाई जा रही है, कर्मचारी वास्तव में वहीं अपनी सेवाएं दे रहा है।
डेपुटेशन पर तैनाती का रिकॉर्ड जरूरी, प्रमाणपत्र के बिना नहीं मिलेगा वेतन
कोर्ट ने डेपुटेशन पर तैनात कर्मचारियों के वेतन और सेवा रिकॉर्ड को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए हैं। अब निर्धारित प्रमाणपत्र के बिना वेतन बिल पास नहीं किया जाएगा।
गलत प्रमाणन हुआ तो अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी।
कोर्ट के निर्देशों के अनुसार गलत प्रमाणन पाए जाने पर संबंधित डीडीओ और ट्रेजरी अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जिम्मेदारी तय की जाएगी।
इसके साथ ही कर्मचारी की सर्विस बुक में दूसरी जगह तैनाती और डेपुटेशन की अवधि समेत पूरा विवरण दर्ज करने को कहा गया है।
डेपुटेशन की आड़ में नौकरी का स्टेशन बदला तो देना होगा हिसाब, वेतन बिल बनेगा बड़ा सबूत
हाई कोर्ट के आदेश के बाद डेपुटेशन पर तैनात कर्मचारियों को लेकर निगरानी बढ़ सकती है। अब सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि कर्मचारी का वेतन किस स्थान से बनाया जा रहा है, बल्कि यह भी प्रमाणित करना होगा कि कर्मचारी वास्तव में कहां सेवाएं दे रहा है।
कई बार कर्मचारी को दूसरे स्टेशन पर काम करने के लिए डेपुटेशन या समायोजन दिया जाता है। लेकिन यदि सर्विस रिकॉर्ड में इसकी जानकारी दर्ज नहीं होती, तो कर्मचारी की वास्तविक तैनाती को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।
अब कागजी रिकॉर्ड और जमीनी ड्यूटी के बीच अंतर छिपाना आसान नहीं होगा।
वेतन बिल के साथ कर्मचारी की तैनाती और ड्यूटी का प्रमाण देने की व्यवस्था इसी दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
शिक्षा विभाग में डेपुटेशन को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग में भी दूरदराज के क्षेत्रों में तैनाती से बचने के लिए ऐसी व्यवस्थाओं के इस्तेमाल के मामले सामने आते रहे हैं।



















