टारगेट न्यूज़ ब्यूरो: सुप्रीम कोर्ट ने अब एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर विचार करने का निर्णय लिया है कि क्या ‘वंदे मातरम’ न गाना किसी के लिए दंडनीय अपराध माना जा सकता है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि वह फिलहाल राष्ट्रगीत के गायन की अवधि या उसके छंदों को लेकर किसी भी तरह के दिशा-निर्देश तय नहीं करेगी, बल्कि उसका मुख्य ध्यान इस बात पर है कि क्या इसे अनिवार्य बनाना संवैधानिक है।
कानूनी पहलू और पिछली नजीर
सुनवाई के दौरान जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने स्पष्ट रूप से संकेत दिए कि इस मामले में कानून का रुख पहले से ही स्पष्ट है। अदालत ने राष्ट्रीय गान से जुड़े एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और न ही न गाने पर उसे दंडित किया जा सकता है।
अदालत ने टिप्पणी की कि संविधान के तहत किसी भी नागरिक को अपनी पसंद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और किसी को भी राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य करना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
केंद्र सरकार का रुख और याचिका
इस जनहित याचिका (PIL) का केंद्र सरकार ने कड़ा विरोध किया है। केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ने याचिकाकर्ता के रुख पर सवाल उठाते हुए इसे ‘नक्सली मानसिकता’ करार दिया। सरकार का तर्क है कि राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान जताना हर नागरिक का कर्तव्य है। हालांकि, अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करे।
मामले के मुख्य बिंदु:
- सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रगीत की अनिवार्यता पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करेगा।
- अदालत ने कहा कि राष्ट्रगान के मामले में पहले ही स्पष्ट आदेश मौजूद हैं।
- केंद्र सरकार को अपना हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा गया है।
- यह मामला व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सम्मान के बीच संतुलन पर केंद्रित है।
आने वाले समय में यह सुनवाई देश में राष्ट्रवाद और व्यक्तिगत अधिकारों की परिभाषा को लेकर एक नई बहस छेड़ सकती है। फिलहाल, अदालत ने सरकार से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई तक मामले को लंबित रखा है।



















